द्रौपदी


सुरक्षा की उमीदें पतियों से लगा कर,
द्रौपदी बैठी थी श्रृंगार करने,
युधिष्ठिर से धर्म निभाकर।
अपने सामर्थ्य को भुला दिया,
पिता-भाई के बल को देखकर।
आंसू बहा रही थी,
अधर्मियों को धर्म बता कर।

परमीत सिंह धुरंधर

वर


मुझे इतना ज्ञान तू दे पिता,
की भूखा भी मैं मुस्कराता रहूँ।
अन्धकार मिले मेरी आँखों को,
या तिरस्कार मिले इस जीवन को,
मैं हर पल तेरा नाम गाता रहूँ।
पतन भी हो जीवन का अगर,
मैं पाप कर्म भी करता रहूँ अगर.
मुझे इतना वर तू दे पिता,
मैं हर पल वेदो को पढ़ता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

भगवान शिव


जीवन की हर धारा पे,
शिव आपका किनारा हो.
कुछ मिले न मिले मुझे,
हे पिता, मुझे तेरा सहारा हो.
मैं अज्ञानता से बंधा हुआ,
आप दिव्या ज्ञान के भंडारी।
मैं पाप कर्म में डूबा हुआ,
आप पुण्य के अवतारी।
हर दंड है स्वीकार मुझे,
बस तेरी गोद में मेरा बसेरा हो.

परमीत सिंह धुरंधर

हया


वो आज भी,
निगाहों में हया रखती हैं,
बस मोहब्बत में ही बेहया हैं.
तरप उठती हैं,
गोरैया के जख्म देख कर,
बस आशिक़क़ों की,
मौत की दुआ रखती हैं.
न जाने क्यों पूजते हैं,
दुनिया वाले देवी कहकर,
वो जो सीने में अब भी,
वासना और फरेब रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

भारत और औरत


हम रंग देते हैं दीवारों को,
पर मेरे पास कोई घर नहीं।
हम लड़ते है सरहद पर,
मेरे अपनों के पास एक छत नहीं।
हम उपजाते हैं आनाज,
अपने पसीनें को जलाकर।
और हमारे बच्चो को,
खाने को भोजन नहीं।
ये देश है बुध-महावीर का,
भारत इसका नाम है.
जहाँ बिकती है नारियां,
और औरतों का सम्मान नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर