जिंदगी


कब तक दुवाओं के सहारे,
जिन्दा रहोगे।
कभी जिंदगी में कुछ और भी तो,
आजमाओ।
ये सच है,
दरिया के मौज़ों में मज़ा है बहुत,
पर कभी शांत, स्थिर समुन्दर में,
भी सबकी तो लगाओ।

परमीत सिंह धुरंधर

दिया और चाँद


चाँद मिल जाए तो फिर,
ताउम्र काट जाए चांदनी में.
पर मेरी मान,
रोज नया दिया जलाने में भी नशा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


यादों की आह,
है मोहब्बत।
कभी देखा है क्या,
पतंगे को साथ रहते हुए.
मोहब्बत में मिटना,
ही है मुक्क़दर।
कभी देखा है क्या,
पतंगे को फिर किस्मत आजमाते हुए.

परमीत सिंह धुरंधर

कीमत


शोहरत पे वो चुनते हैं साथी,
कीमत लगा – लगा के.
और फिर ताउम्र रोते हैं,
उनको  बेवफा बता के.

परमीत सिंह धुरंधर

दुश्मन


सजा देते, देते
दुआ दे गए.
दुश्मन मेरे,
मुझको गले से लगा के.
जिसके लिए,
दुनिया छोड़ी।
वो ही खंजर चुभा गए,
मुझको गले से लगा के.

परमीत सिंह धुरंधर

कालेज में एक लड़की


एक लड़की,
एक लड़की.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
भोला-भला चेहरा,
कातिल अंगराई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
खुली जुल्फें, और
थोड़ा शरमाई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
किताब दबाये सीने से,
पलकों को झुकाते आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
चलती है ऐसे रुक-रुक के,
जैसे बदली कोई छाई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
कल से जाएंगे हर लेक्चर,
देखें, किसकी किस्मत में आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.

परमीत सिंह धुरंधर

जय माँ शारदे


जय माँ शारदे,
विद्या-बुद्धि,
मेरे मस्तक में भर दे.
ह्रदय की धड़कनों में,
हो आपकी वीणा की झंकार।
और साँसों में मेरे मैया,
संस्कार भर दे.
आँखों में हो रौशनी,
धर्म-ज्ञान की.
और मेरे धमनियों में,
परोपकार भर दे.

परमीत सिंह धुरंधर

नीलाम


उनकी बेवफाई का गम नहीं है,
गम है की,
उन्होंने मेरी मोहब्बत को बदनाम किया।
हम दोनों ने बनाया था वो घोसला,
टुटा-फूटा, जो भी था हम दोनों का था,
जिसको उसने सरे आम नीलाम कर दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

नशा


नशा तो बहुत किया,
असर भी बहुत हुआ.
पर जब उनको देखा,
तो हर जाम छूट गया.
मुलाकाते तो बहुत हुई,
बाते भी बहुत हुई,
पर उन्होंने जब छुआ,
होठों से,
तो हर गम मिट गया.

परमीत सिंह धुरंधर

बाढ़


खौफ बढ़ चूका है, दीवारे ढह चुकीं हैं.
मंदिर और मस्जिद दोनों सुनसान पड़े हैं.
वो निकलीं है आज सज के, सवर के,
बूढ़े भी अब ईमान छोड़ चुके हैं.
गली, चौरास्ता, छत, पेड़, खुलेआम,
हर मोड़ पे भीड़ बढ़ चुकी है.
हर सख्श पसीने से तर-बतर,
दिल की धड़कने थम चुकी है.
वो निकली हैं आज अपनी जुल्फें लहरा के,
बढ़ई, लोहार, धोबी, हलवाई,
जोरू, गोरु, सब काम छोड़ चुके हैं.
आग बढ़ रही है, रूह काँप रही है,
कंठ सुख रहे हैं, तन-मन तरप रहा है.
हिन्दू-मुस्लिम, जाट-पात, सब मिट चूका है,
हर तरफ से, छोटे-बड़े सबकी निगाहें टिक चुकी है.
वो निकली हैं आँखों में सुरमा लगा के,
अमीर-गरीब, गावं- जवार, पंडित-मौलवी,
सब इस बाढ़ में डूब चुके हैं.

परमीत सिंह धुरंधर