राजा जी


सैयां तहरे जवानी के किस्सा रहल,
जो कचहरी में चलल रहल.
पंच-प्रमुख भी का करियन तहरा के,
उनकरो घरे त ताहर काँटा फसल रहल.
बड़ा कइलअ तू मनमानी राजा जी,
गाउँवा में सबके बनइलअ तू नानी राजा जी.
छोड़अ अब ई सब धंधा हमरो पर धयान द राजा जी,
अब संभालअ तू आपन घर और दुआर राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर

दरिया


इतना मत सोच दिल मोहब्बत की नाकामियों पे,
जिंदगी में तुझे और भी बोझ उठाना बाकी है.
कब तक झुकाएगा खुद को खिदमत में किसी की,
अभी इबादत में में सर को झुकाना बाकी है.
और कितना भागेगा अपनी प्यास मिटने के लिए,
अभी तेरा इस जिंदगी में दरिया तो बनना बाकी है.

परमीत सिंह धुरंधर

शिकायत


चंद पलकों की शिकायत,
की हम में कुछ नहीं है,
उनके होठों से मेरे कानो तक,
आते-आते ज़माने गुजर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताज


मोहब्बत वो शौक है जालिम,
जो सिर्फ जमाने को दिखने के लिए है.
वरना उनके आगोश में गए,
अब तो जमाने गुजर गए.
ताज भी बनाया तो उनकी मौत के बाद,
एक सुकून पाने में जिनको जमाने गुजर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


अब क्या मोहब्बत करूँ, जो शौक था मेरे,
तूने तोड़ दिया, मैंने छोड़ दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

काला तिल


इतना खूबसूरत जिस्म,
पे ये काला तिल.
खुद ने लगा के तुम्हे उतरा है,
सबका दिल चुराने के लिए.
हम कहाँ तक खुद को बचाएं,
ये सितम तो है सबके उठाने के लिए.
तू मोहब्बत दे, या ठुकरा दे,
ये है तेरी मर्जी.
हम तो आते रहेंगे तेरे दर पे,
ये फ़रियाद सुननाने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

अकेला


सुबह इतनी बारिश हुई,
की मैं शाम तक गीला रहा.
जिस रात हमें तुम छोड़ गयी थी प्रिये,
मैं सागर के तट पे टहलता रहा.
उठती हुई लहरो के बीच,
मैं अकेला ही जूझता रहा.
अनुकूल नहीं वो प्रतिकूल पल था,
विफल रही हर एक योजना।
मज़धार में फंसा मैं,
तेरी तस्वीर को संजोता रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनौती


रौशनी करो,
दूसरों की जंदगी में.
तभी दुःख मिटेगा,
सामाज से.
उत्सव होगा,
समूह गान होगा.
जैसे उषा के आने पे,
प्रकृति कलरव करती है.
तभी हर इंसान,
प्रयाश करेगा।
जैसे अंधेरो में दुबके,
अपने पंखों को समेटे पक्षी,
पंखो को पसार,
आकाश को चुनौती देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


बहुत कष्टमय होता है वो जीवन,
जिसका हर क्षण पुष्पों के साथ गुजरे।
काँटों का दर्द यहाँ कौन समझता है,
जहाँ हर भौंरा पुष्प को चूमता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन चक्र


सूरज ने जब तपाया धरती को,
बादलों ने दी शीतलता।
एक बीज कही अंकुरित हुआ गोद में,
वृक्षों ने फिर लीं धरती पे साँसे।
थका-हारा एक राही,
जब छाँव में सुस्ताने बैठा।
तो वृक्षों ने दी उसके साँसों में,
जीवन की एक नई आशा.
जीवन का ये ही चक्र है,
छोटा-बड़ा, कोमल -पत्थर।
एक जीवन दूसरे जीवन से,
एक हाथ, दूसरे हाथ से बंधा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर