लक्ष्य


सबका हित हो,
सबका कल्याण हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
न किसी का शोषण हो,
न कोई शोषित ही रहे.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
ना कोई बच्चा दूध को तरसे,
ना बूढें अब भोजन को.
शिक्षित – अशिक्षित सबका,
सबपे हक़ अब सामान हो.
किसी एक के आंसू पे,
ना दूसरे का मुस्कान हो.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

काबिल नहीं है


वो बैठी हैं अपने कमरे में,
एक तस्वीर को सीने से लगाये.
की कल तक जिस दिल में हम बसते थे,
उस दिल में किसी और को छिपाए.
हमने पूछा की हुजूर,
क्या रखा है सीने में छुपा के.
वो मुस्कराये, खूब मुस्कराये,
राज को सीने में गहरा दबा के.
फिर हौले से बोले आँचल को संभाल के,
कुछ राज सीने में ही अच्छे है,
वो होठों के काबिल नहीं हैं.
अपनी मोहब्बत का वास्ता दे कर,
जब हमने मिलना चाहा।
बड़े प्यार से मेरे महबूब ने,
संदेसा भिजवाया.
मेरे बाबुल का समाज में रुतबा है,
ये मोहब्बत अब उसके काबिल नहीं है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गरीबों की सुन ले ए दाता


गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
भोले – भाले,
पल में छले जाते हैं,
बेबस, लाचार,
अपने शर्म से मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ाद


अपनी माँ की दुवाओं का, मैं एक हिसाब हूँ,
तेरी गुलशन में मालिक, मैं आज भी आज़ाद हूँ.
सितमगर ने तो ढाए वैसे कई सितम हम पर,
पर हौसले से सीने में, मैं आज भी बुलंद हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

बेवफाई


खिदमत माता – पिता की,
कभी बेकार नहीं जाती।
किस्मत यार की कभी,
किसी के काम नहीं आती।
गुलशन में लाखों फूल खिले हैं,
पर भौरों के प्यास नहीं जाती।
हज़ारो तारे हैं आसमान पे,
एक चाँद के बिना,
अमावस्या की अन्धकार नहीं जाती।
और क्या लिखूं उनकी बेवफाई पे,
कम्बखत,
मेरी साँसों से उनकी महक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


मैंने खुदा से पूछा,
की कब तक रखोगे,
इस जालिम जमाने में मुझे.
तो खुदा बोलें,
की अभी ज़माने में,
तेरी चाहत बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


सितमगर की निगाहों से मत देख,
मोहब्बत को खुदा ने बनाया है,
हम जाबांजों के लिए.
जाने क्यों करते हैं लोग,
हुस्न के आगोस की तमन्ना.
मोहब्बत को खुदा ने बनाया है,
बस इबादत के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बांकपन


तारीखे-मिलन पे चर्चा करनी हो अगर,
तो महफ़िल में मेरा कोई काम नहीं.
जश्ने-कुर्बानी मनानी हो अगर,
तो मेरा बांकपन अभी बाकी है.
होठों को पीने की तमन्ना अब कहाँ,
रक्त का कतरा बहना हो अगर,
तो मेरी जवानी अभी बाकी है.
मत पूछो की जोशे-उद्गम कौन है मेरा,
अभी इस सागर में,
कितनी नदियों का मिलना बाकी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

1857


धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
दिन हो या हो रात,
अब खुले-आम लड़ाई होगी.
तीरों से, भालों से,
बरछी और कटारों से.
ईंट से, पत्थर से,
सबसे पिटाई होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
खेत में, खलिहानों में,
बथानों में, मैदानों में.
पहाड़ो पे, दीवारों पे,
खुले-आम चढ़ाई होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.
बच्चे हों या हों बूढें,
या हो नर और नारी.
रंक हो या राजा,
या हो शूद्र, या भिखारी.
मातृभूमि पे बलिदान की,
अब की सबकी बारी होगी.
धुआंधार लड़ाई होगी,
सरे-आम लड़ाई होगी.

परमीत सिंह धुरंधर