लम्हें


तेरी पलकों से इतना बिसरे हैं,
अब घुल रहे मेरे भी मिसरे हैं.
अर्ज करें से पहले कुछ भी,
तेरी इज़ाज़त चाहिए.
अब मेरी जिंदगी के बचे,
कुछ ही लम्हें हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

बेवफाई


उनकी बेवफाई का गम तो बहुत है,
पर जिंदगी में दर्द भी तो बहुत है.
रोज सोचता हूँ,
आज सारे दुश्मनों को मिटा दूँ,
पर कमबख्त,
इस दिल में मोहब्बत भी तो बहुत है.
कैसे रखूं तलवार उनके गर्दन पे,
उनकी आँखों में आंसू भी तो बहुत है.

परमीत सिंह धुरंधर

समर


समर में समर ने,
दिखाया ऐसा होसला.
समर ही नहीं बचा कोई,
अब समर के लिए.
एक हम ही हैं,
उलझे हुए हैं अब भी समर में.
जाने कितने समर बचे हैं और,
मेरे इस जिन्दगी के समर में.

परमीत सिंह धुरंधर

जवान भैसें


काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।
छोड़ दूँ तो लूट लेंगी,
रात भर में गावं।
खूब खिलता हूँ,
तेल पिलाता हूँ।
रखता हूँ इनका,
कितना धयान।
काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।
सारे हैं दीवाने मेरी भैस के,
पंच, प्रमुख से पहलवान।
सभी है इसकी आँखों के कायल,
दोस्त, दुश्मन से अनजान।
काली-काली मेरी भैसें,
हैं इतना जवान।

परमीत सिंह धुरंधर

अगस्त 22


प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
शब्द मत समझना इन्हे कलम के,
मैंने साक्षात इसमें अपना ह्रदय रखा है.
तुम्हारी कमर पे हरपल झूलती,
वो चोटी मेरे ह्रदय की वीणा हैं.
जिसे मैंने तुमसे दूर इस शहर में,
अब तक हर एक पल में झंकृत रखा है.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
हर सुबह,
तुम्हारी केसुओं से जो छनती थी बुँदे,
मैंने उसे, विरहा के इस तपते रेगिस्तान में भी,
अपनी पलकों में संजोये रखा हैं.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
सब कुछ निपटा के, हर दीपक बुझा के,
जब तुम कमरे में आती थी एक दिया जला के,
मैंने आज तक, जीवन के हर निराशा में,
असफलता में, उसकी लौ को अपने सीने में,
प्रज्जवलित रखा है।
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चिड़ियाँ


चिड़ियाँ उड़ाने का शौक रखने वालों,
संभल जाओ,
अब शिकारी हो गयी हैं चिड़ियाँ।
घोंसलों में कहाँ ठहरती हैं,
की अब बड़ी आधुनिक हो गयी हैं चिड़ियाँ।
अपने पंखो को संभल के रखती हैं,
पराएं पंखो पे सवार होक उड़ती हैं चिड़ियाँ।
चिड़ियाँ पालने का शौक रखने वालों,
संभल जाओ,
अब चालाक हो गयी हैं चिड़ियाँ।
दाना चुगते – चुगते अब चुग,
जाती हैं इंसान भी चिड़ियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खता


पलकों से उनके, मैं मोहब्बत कर बैठा,
ये ही तो खता हुई, उनकी चाहत कर बैठा।
अब होठों से सुरु होती है हर कहानी,
मैं लल्लू, आँखों में उनके डूब बैठा।

परमीत सिंह धुरंधर

जय माँ सरस्वती


जय माँ सरस्वती,
मुझे प्यार दीजिये।
इस जीवन में मुझे,
संपूर्ण ज्ञान दीजिये।
वेद पढूं, पुराण पढूं,
उपनिषद तक पढ़ जाऊं।
उम्र छोटी हो, पर
मस्तक विशाल दीजिये।
देह को पीड़ा मिले तो मिले,
पर मन को विद्या-दान दीजिये।
जय माँ सरस्वती,
मुझे प्यार दीजिये।
इस जीवन में मुझे,
संपूर्ण ज्ञान दीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नया दौर


ये दुश्मनी का नया दौर है,
मोहब्बत में इलज़ाम लगाना,
अब शौक है.
कल तक रोती थीं जो मेरी,
पहलु में आने को.
आज मेरी पहलु से जाने,
को बेताब हैं.
एक रात के लिए जो,
अब्बा-अम्मा से लड़ गयी.
एक रात भी अब नहीं गुज़ारेंगी,
ये कह के मुख मोड़ गयीं.
ये वक्त का नया दौर है,
हर रात एक नया शौक है.
बहती गंगा में कौन नहीं हाथ धोता,
आज हुश्न से बड़ा गंगा कौन है.
ये अंदाजे-रुख का नया दौर है,
सबको फ्रेंडशिप का शौक है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पालनहार


माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.

परमीत सिंह धुरंधर