रणभूमि में उतर चला हूँ,
शायद लौट के ना आ पाऊं,
पर याद बहुत आ रहे हो पिता।
की जिन पत्थरों को उड़ा देता था,
तुम्हारी संरक्षण में तीरों से।
आज उन्ही का आकार देख कर,
डर गया हूँ मैं पिता।
सुलोचन की आँखों और,
माँ के प्यार से भी ज्यादा।
दुश्मनो के बीच में,
याद आ रही है तेरी गोद ए पिता।
परमीत सिंह धुरंधर