अर्जुन-कृष्ण


विकराल रूप ले के भगवान बोलें,
अरे खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का आज तुझे मैं सच दिखलाऊं,
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ऐसा नहीं जो मुझसे न हो बंधा,
ऐसा नहीं जो न हो मेरा यहाँ।
मैं ही नदियों की धारा,
मैं पर्वत हूँ।
मैं ही पुष्प उपवन का,
मैं उसका भ्रमर हूँ।
मैं रात का अंधियारा,
मैं ही सूरज का ताप हूँ।
मैं नारी का सौंदर्य,
मैं ही पुरुष का काम हूँ।
आज तेरे हर भ्रम को मैं हर जाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
सुनहरे अक्षरों में जब इतिहास लिखेगा,
वीरों से पहले तेरा नाम लिखेगा।
धर्म की आज ऐसी होगी स्थापना,
सदियों तक धरती पे तेरा नाम गूजेंगा।
आज तुझे साक्षात हरी से मिलाऊँ।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ये हैं भीष्म, जिनकी तू गोद में खेला,
ये हैं गुरु द्रोण जिनसे तुम्हे ज्ञान है मिला।
द्रौपदी की लाज इनके सामने उतरी,
चौरस की बाजी पे जब तू था बिका।
ये भाई, बंधू, सखा, सहोदर,
इनसे पूछ तो जरा।
उस दिन तो भूल गए थे तुझसे नाता,
और आज क्यों, फिर हर कोई,
तेरे विरुद्ध है खड़ा।
इस रणभूमि में तुझको,
आज अपने -पराये का भेद समझाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
तू जिन्हे समझता है अपना,
वो तेरे विरुद्ध हैं खड़े।
देख, तेरे गैर, आज तेरे लिए,
मौत से भिड़ने को हैं डटे।
तू नहीं उठाएगा जो गांडीव अपनी,
भीष्म, द्रोण, कर्ण,
वो तेरे अपनों का संहार करेंगे।
इस रणभूमि में तुझको,
आज कर्म का पाठ पढ़ाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

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