यूँ न रूठो तुम की जिनगी मौत सी लगे,
डूबकर आँसूओं में एक प्यास होंठो पे जगे.
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ न रूठो तुम की जिनगी मौत सी लगे,
डूबकर आँसूओं में एक प्यास होंठो पे जगे.
परमीत सिंह धुरंधर
नजरे मिलानी ही है तुझे तो फिर ये पर्दा न कर,
और बाँध रखा है अगर हया ने तो मुझे यूँ बुलाया न कर.
परमीत सिंह धुरंधर
रौशनी वो ही की फिर अँधेरा ना हो,
और चुम मुझे ऐसे की फिर सबेरा ना हो.
परमीत सिंह धुरंधर
नदिया बोली सागर से,
इश्क़ तेरा झूठा है.
मैं आई इतनी दूर से,
प्यार में तेरे भागी -भागी।
तू एक कदम भी ना आगे बढ़ा,
प्यार तेरा छोटा है.
सागर बोला सुन प्रिये,
प्यार मेरा ही सच्चा है.
तू बहती है तोड़ के,
हर रिश्ते, मर्यादा को,
मैंने संभाला के रखा है,
अपने किनारों को.
तू राह बदल दे जब भी चाहे,
मैंने बाँध रखा है,
अपनी धाराओं को.
ऐसा नहीं की मुझे तेरी चाह नहीं,
पर डरता हूँ तेरी चंचलता से.
वरना आज भी,
मेरे इन अधरों पे,
तेरा चुम्बन वो ताजा है.
और मेरी बाहें तेरे जिस्म से,
आज भी महका-महका है.
परमीत सिंह धुरंधर
हर सीरत का एक सूरत है, हर सूरत में सीरत नहीं,
हर जोड़े में एक इश्क़ हैं, हर इश्क़ का जोड़ा नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मयखाने सारे सुख गए,
नजराने सारे खो गए.
कोई कैसे जिए,
कब तक उम्मीदों के सहारे.
जब सबके घर,
यहाँ बस गए.
परमीत सिंह धुरंधर
धीरे-धीरे विचलित हो रहा है मन, रूप तेरा देख के,
संयम कैसे रखूं, बता जरा अपने नयनन से.
कोई सजा, मौत की भी परवाह नहीं,
एक बार मिल जाए अधर मेरे तेरे अधरों से.
परमीत सिंह धुरंधर
उसका नाम था बिंदिया,
सावलें बदन पे,
रखती थी जो दो चंचल अँखियाँ।
कैसे ना डूबता,
उसके प्यार के सागर में,
एक ही मुस्कान से उदा देती थी,
जो रातों की निंदिया।
अच्छे पल थे,
सुनहरे कल के सपनों में।
मुझे क्या पता था की,
मेरी जल जायेगी दुनिया।
इल्जाम मुझपे ही आये सारे,
कुछ पल मैं भी,
गम और शिकायत में जिया।
मगर, यहाँ से अब न शिकायत है,
न कोई कोसिस।
बस याद आती है,
उनकी वो बेवफाई,
और उनकी मीठी बतिया।
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ इतना भी न कीजिये,
की उनके रहमो-करम पे हों साँसें।
दिल जलता है तो जल जाए,
हमें नहीं चाहिए वैसी रातें।
परमीत सिंह धुरंधर
मुझसे मत पूछो इन आँखों का कुसूर,
शहंशाह तो मैं ही आज भी, पर वे हैं मेरे हुजूर।
जुल्म भी उनकी और हम उफ़ तक न करे,
खिदमत भी उनकी और वो खुश न रहें,
की मोहब्बत का बस एहि है दस्तूर।
परमीत सिंह धुरंधर