चाहत


मेरी धमनिकाओं में रक्त प्रवाहित है,
तुम्हारी साँसों की चाहत में.
और मेरी साँसों में स्पंदन प्रज्जवलित है,
सिर्फ तुम्हारी धमनिकाओं की आहट से.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


मैं अपनी माँ की चरणों को,
गंगा समझता हूँ,
मुझे धर्म से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये तीर्थ करता हूँ.
मैं अपनी माँ की बोली को,
गीता समझता हूँ.
मुझे वेद-पाठ से क्या लेना देना,
मैं तो ये ही कर्म रोज करता हूँ.
मैं तो अपनी माँ के हाथों के खाने को,
प्रसाद समझता हूँ,
मुझे कथा-वाचन से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये ही पुण्य कमाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीब


इतना गरीब हूँ मैं,
इतना गरीब हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मैं बेबस हूँ, लाचार,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
सोच-सोच के आती है नींदे,
और ओस की बूंदों सी उड़ जाती है।
लेटे-लेटे चारपाई पे मैं,
बस तारे गिनता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
बस पानी पीता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।
वो ढूंढे सोना -चांदी,
मेरे तन पे कपड़े नहीं।
उनके आँखों में हज़ार सपने,
मेरा कोई ठौर नहीं।
वो रातों को भी हंसती हैं।
मैं दिन में भी शांत बैठता हूँ।
इतना गरीब हूँ मैं,
पुवाल पे सोता हूँ।
मुझे कोई ख़्वाब नहीं,
मुझे उनसे प्यार नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

महफ़िल


अब मैं महफ़िल में नहीं,
मयखानों में बैठा हूँ,
महफ़िल की शान तो वो हैं,
जिनकी यादो का ये जाम,
मैं उठाये बैठा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


ये दर्द जो तेरे दिल में है,
इसे कही, दबा दे, दफना दे,
मिटा दे, कुछ कर दे,
या तो जला दे.
इसे किसी को बताने में क्या रखा है.
और जब उन्हें ही नहीं है,
तेरे दर्द से वास्ता,
तो फिर किसी और से,
उम्मीद क्यों लगा के रखा है.
बहुत गिरे हैं इस राहे-मंजिल में,
मेरी मान मेरे दोस्त,
उनके बिकने से,
तेरा गिरते रहना है अच्छा है.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


आँखों में माया रखती हैं,
ह्रदय में छलावा रखती हैं.
तुम कहते हो प्रेम उसे,
वो तो दिखावा करती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

श्रृंगार


वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.
इश्क़ हो ना हो मुझे उनसे,
मगर वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं.
ये सच है की हमारा मिलन,
परिवार वालों ने कराया था.
मगर अब वो जन्मो की,
जानी-पहचाननी सी लगती हैं.
मुझे कहाँ याद आती है उनकी,
दोस्तों की भीड़ में.
मगर सहेलियों के बीच,
वो मेरा ही चर्चा चलाती हैं.
दिन में कहाँ फुर्सत है उनको,
की पास आके मेरे बैठें.
वो तो बस छू कर ही,
अपना हाले-दिल सुनाती हैं.
मैं तो चिल्लाते रहता हूँ,
हर घडी, उनका नाम,
एक पल जो ना सुनाई दूँ उनको,
तो दौड़ी-दौड़ी चली आती हैं.
वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

अर्जुन-कृष्ण


विकराल रूप ले के भगवान बोलें,
अरे खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का आज तुझे मैं सच दिखलाऊं,
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ऐसा नहीं जो मुझसे न हो बंधा,
ऐसा नहीं जो न हो मेरा यहाँ।
मैं ही नदियों की धारा,
मैं पर्वत हूँ।
मैं ही पुष्प उपवन का,
मैं उसका भ्रमर हूँ।
मैं रात का अंधियारा,
मैं ही सूरज का ताप हूँ।
मैं नारी का सौंदर्य,
मैं ही पुरुष का काम हूँ।
आज तेरे हर भ्रम को मैं हर जाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
सुनहरे अक्षरों में जब इतिहास लिखेगा,
वीरों से पहले तेरा नाम लिखेगा।
धर्म की आज ऐसी होगी स्थापना,
सदियों तक धरती पे तेरा नाम गूजेंगा।
आज तुझे साक्षात हरी से मिलाऊँ।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ये हैं भीष्म, जिनकी तू गोद में खेला,
ये हैं गुरु द्रोण जिनसे तुम्हे ज्ञान है मिला।
द्रौपदी की लाज इनके सामने उतरी,
चौरस की बाजी पे जब तू था बिका।
ये भाई, बंधू, सखा, सहोदर,
इनसे पूछ तो जरा।
उस दिन तो भूल गए थे तुझसे नाता,
और आज क्यों, फिर हर कोई,
तेरे विरुद्ध है खड़ा।
इस रणभूमि में तुझको,
आज अपने -पराये का भेद समझाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
तू जिन्हे समझता है अपना,
वो तेरे विरुद्ध हैं खड़े।
देख, तेरे गैर, आज तेरे लिए,
मौत से भिड़ने को हैं डटे।
तू नहीं उठाएगा जो गांडीव अपनी,
भीष्म, द्रोण, कर्ण,
वो तेरे अपनों का संहार करेंगे।
इस रणभूमि में तुझको,
आज कर्म का पाठ पढ़ाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

सुलोचना और मेघनाथ


रणभूमि में उतर चला हूँ,
शायद लौट के ना आ पाऊं,
पर याद बहुत आ रहे हो पिता।
की जिन पत्थरों को उड़ा देता था,
तुम्हारी संरक्षण में तीरों से।
आज उन्ही का आकार देख कर,
डर गया हूँ मैं पिता।
सुलोचन की आँखों और,
माँ के प्यार से भी ज्यादा।
दुश्मनो के बीच में,
याद आ रही है तेरी गोद ए पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन और दहेज़


दुल्हन ने जो घूँघट उठाई,
हर बाराती बहक गया.
मगर दूल्हा,
एक दहेज़ के लिए,
उस दुल्हन को छोड़ लौट गया.
मैंने तो हाथ बढ़ाया,
उसी मंडप में उसे थाम लेने को.
मगर मेरी मुफलिसी और ये गरीबी,
उस दुल्हन ने भी अपना मुख मोड़ लिया.

परमीत सिंह धुरंधर