पिता ने दी है ये जिंदगी,
पिता पे ही लूटा दूंगा ये जिंदगी।
बिन पिता कुछ भी नहीं,
हैं ये जिंदगी।
तुम्हारे लिए छोड़ दिया है,
धर्म – ज्ञान की गाथा।
मैं तो लहराता रहूँगा,
अपने पिता का पताका।
पिता ने सींचा है मेरे प्राणों को,
पिता पे ही लूटा दूंगा अपने प्राणों को.
बिन पिता कुछ भी नहीं,
प्राणों की ये वेदी।
परमीत सिंह धुरंधर