हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर
हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर