भारत-रत्न और रामचन्द्र गुहा का इतिहास


बिहार के दूर -दूर के गावों में, आज भी रात को जब कोई माँ अपने रोते हुए बच्चे को दूध पिलाती है, तो कहती है “जल्दी – जल्दी पी के बड़ा हो जा, तुझे पढ़ने BHU भेजूंगी।” और रामचन्द्र गुहा कहते है की पंडित मदन मोहन मालवीया जी का योगदान रविन्द्र नाथ टैगोर से काम हैं. बिहार की कोई माँ टैगोर तो दूर शांतिनिकेतन का नाम भी नहीं सुनी है. रामचन्द्र गुहा के अनुसार मानव का शरीर और जीवन प्रमुख योग्यता है, ना की उसका कर्म, भारत रतन प्रुस्कार को प्राप्त करने के लिए.

परमीत सिंह धुरंधर

बनारस हिन्दू विश्विधालय (BHU)


बहुत काटा है पत्थरों को, तब जाके ये मूरत बनी है.
यूँ ही नहीं बनारस हिन्दू विश्विधालय (BHU) की ये नींव पड़ी है.

परमीत सिंह धुरंधर

Coincidence


Is it coincidence? Gandhi and Godse both have ‘G’, Ram and Ravan have ‘R’ and Krishna and Kansa have ‘K’.

Parmit Kumar Singh

ख़्वाब


ख़्वाब तो टूटते ही रहते हैं मेरे,
किस्मत वालों से कह दो,
बंजारे भटकते रहते हैं.
इल्जाम आये तो हम मुकरते हैं,
दहाड़ रखने वालो को, दुनिया वाले,
अहंकारी कहते रहते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

जुदाई


ए दिल तुझे कितना देखें शरारत से,
कहानियों की रात अब खत्म हो गयी.
जिसके लिए किस्सा गढ़ते हैं दिन भर,
राहें उनकी हमसे जुदा हो गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


दुआओं से जिंदगी नहीं चलती,
सितारों से कह दो,
हम तन्हा रहते हैं।

परमीत सिंह धुरंधर

ए जालिम


उम्र ऐसे ये ढलने लगी हैं,
मेरी नजर तेरे सीने पे लगी है.
कभी मुझसे भी आके मिल, ए जालिम,
मोहब्बत अब अगन बन गयी है.
तेरी मंजिल मेरी ये तड़प हैं,
मेरी चाहत है पाना तुझे।
अपनी ये जिद छोड़ भी दे, ए जालिम,
जिंदगी अब कहर बन गयी है.
लगेगी रोज भीड़ तेरी दीदार पे,
जिंदगी है तनहा ये बिना तेरे श्रृंगार के.
पर्दा ये अब हटा भी दे, ए जालिम,
दुरी ये अब जहर बन गयी है.

परमीत सिंह धुरंधर

खालीपन


तेरी आँखों का कालापन,
मेरे मन का कुँवारापन।
एक है सागर की गहराई लिए,
और एक में, दहकते रेगिस्तान का सूनापन।
तेरी योवन का ये अकेलापन,
मेरे मन का ये बंजारापन।
एक है हिमालय सा उन्नत,
और एक में अनंत बसा ये खालीपन।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


तेरी मोहब्बत का क्या सिला दें,
हम निगाहों से पीते हैं, तुम चेहरे पे हिजाब रखते हो.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


शरारत हुई है तो,
गुस्ताखी भी होगी।
हुस्न अगर पास है,
तो इतना न इठला,
निश्चित ही,
क़यामत भी होगी।

परमीत सिंह धुरंधर