दिल


क्या – क्या संभालोगे इस जहाँ में,
एक दिल तो तुम्हारा संभालता नहीं।
इतने ठोकरों को खा के मोहब्बत में,
नदाने-इश्क़ तुम्हारा छूटता नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

यार


गैरों की बाते करने की किसको फुर्सत,
हम तो एक यार के पीछे जिंदगी गुजार गए.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ रातों को रोता हैं,
हुस्न के पास तो जमाना है मुस्कराने को.
सोचो, उस माँ पे क्या गुजरती होगी,
जिसका बेटा कमाता है, मयखाने में लुटाने को.

परमीत सिंह धुरंधर

समर का शंखनाद


हर दिशा में गूंज रहा है समर का शंखनाद,
हवाओं में है बेचैनी, फिजाओं में है तनाव।
हर दिशा में गूंज रहा है समर का शंखनाद।
हर नजर लगी है बस समर की ही ओर,
की जल्दी ही होगी एक नयी भोर।
की कोई एक अकेला ही समर में इंद्रा होगा,
की समाप्त होगा जल्द ही वर्चस्व का ये विवाद।
हर दिशा में गूंज रहा है समर का शंखनाद।
हर दिशा में गूंज रहा है समर का शंखनाद।

परमीत सिंह धुरंधर

नथुनिया


रोज करेलअ,
छपरा, सीवान, मलमलिया।
सैयां कहिया आई,
हो नथुनिया।
तानी सबर धरअ न,
साथे ले आइम पैजनिया।
खूब बोलेलअ,
चाँद, चंदा, चंदनिया।
सैयां कहिया आई,
हो नथुनिया।
तानी सबर धरअ न,
साथे ले आइम पैजनिया।
रोज काटेलअ,
गेहूं, धान, धनिया।
सैयां कहिया आई,
हो नथुनिया।
तानी सबर धरअ न,
साथे ले आइम पैजनिया।
सबके पढ़ेलअ,
कथा, कहानी, चिठिया।
सैयां कहिया आई,
हो नथुनिया।
तानी सबर धरअ न,
साथे ले आइम पैजनिया।

परमीत सिंह धुरंधर

पाप


बचपन,
जो प्रगतिशीलता का विरोध करता है.
बचपन,
जो आधुनिकता का विरोध करता है.
बचपन,
जो, “मैं ही सबसे अच्छा हूँ”, में विश्वास रखता हो.
ऐसा बचपन जब जवानी में आता है,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.
जवानी,
जो अपने घर को टुटा-फूटा समझती हैं.
जवानी,
जो अपने इतिहास, साहित्य की निंदा करती हैं.
जवानी,
जो अपनी पत्नी को कुरूप और भोग्या समझती हैं.
ऐसी जवानी जब मस्तक पे छाती हैं,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे अपने किये पे पछतावा होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे हर छाया में स्त्री का आभास होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे ह्रदय में वासना का निवास होता है.
ऐसा बुढ़ापा जब शरीर पे आता है,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


पिता ने दी है ये जिंदगी,
पिता पे ही लूटा दूंगा ये जिंदगी।
बिन पिता कुछ भी नहीं,
हैं ये जिंदगी।
तुम्हारे लिए छोड़ दिया है,
धर्म – ज्ञान की गाथा।
मैं तो लहराता रहूँगा,
अपने पिता का पताका।
पिता ने सींचा है मेरे प्राणों को,
पिता पे ही लूटा दूंगा अपने प्राणों को.
बिन पिता कुछ भी नहीं,
प्राणों की ये वेदी।

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.

परमीत सिंह धुरंधर

जीजाबाई


जो लिख रहें हैं कलम-वाले,
पत्नियां बदलती हैं समाज को.
वो क्या समझेंगें, कैसे पला था,
जीजाबाई जी ने, शिवा जी महाराज को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


वो करती है गुजरा, थाली में बचे चाँद चावल के दानें से.
माँ तो मात देती भूख को भी, बस बेटे के मुस्कराने से.

परमीत सिंह धुरंधर