यकीन


मुझे पीने का शौक हैं,
तू पिलाने की शौक़ीन बन.
छोड़ ये वफ़ा, बेवफाई की बातें,
तू एक बार तो,
इन बादलों की जमीन बन.
मुझे बरस कर,
मिट जाने का डर नहीं।
तुझे भींग कर,
लहलहाने में भय है.
कब तक टकटकी लगाओगे,
खुदा के दर पे मदद की,
कभी तो अपने योवन का यकीन बन.

परमीत सिंह धुरंधर

बाप ने जिंदगी दी है, बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा.


मेघनाथ: प्रणाम काका श्री. अच्छा हुआ, आप दिख गए. मई असमंजस में था की आप से मिलकर रणभूमि में जाऊं या जाकर मिलूं।
विभीषण: पुत्र, मैं तो तुम्हारा सदा से शुभचिंतक रहा हूँ. मेरी तुमसे कोई बैर नहीं है पुत्र.
मेघनाथ: हा हा हा हा!! काका श्री, पिता से बैर और उसके पुत्र से प्रेम। मैं वैसा पुत्र नहीं हूँ.
विभीषण: मैं तुम्हारे पिता का सागा भाई हूँ, उनका बैरी नहीं।
मेघनाथ: तो दुश्मनों की छावनी में क्यों ?
विभीषण: क्यों की, लंकेश धर्म भूल चुके हैं. तुम तो ज्ञानी हो. मैंने भ्राता कुम्भकर्ण को भी समझाया। तुम्हे भी कहता हूँ, ये युद्ध छोड़ के श्री राम के शरण में आ जाओ. इसमें हम सब का भला छुपा है.
मेघनाथ: बहुत-बहुत धन्यवाद काका श्री। अगर सबका भला इसी में छुपा रहता तो आपकी माता श्री आज यहाँ आपके साथ होती, वहाँ लंका में नहीं।
मेघनाथ: अगर श्री राम भगवान भी है, और स्वयं नारायण भी अपने असली रूप में आ जाएँ, तो भी मैं लंका का प्रतिनिधित्व करूंगा।
मेघनाथ: आखिर में इतना ही कहूँगा, काका श्री की “बाप ने जिंदगी दी है….. बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा।”

परमीत सिंह धुरंधर

खूबसूरत – मोड़


खूबसूरत से एक मोड़ पे,
तन्हा सा मैं बैठा था.
तू गली में जब निकल कर आई,
किस्तों में दिल टुटा था.
नजरे झुका कर, तू चल रही थी,
अपने आँचल में सब कुछ छुपाएँ,
तेरी लहराती जुल्फों की,
हर लट से मेरा दिल उलझा था.

परमीत सिंह धुरंधर

भांग


योवन के धुप में,
तू ऐसे है खिल गयी.
जैसे अमीरों के बस्ती में,
गरीबों के चादर उड़ी.
तेरे अंगों पे ऐसे बहकने लगे,
मोहब्बत के परवाने।
जैसे छोटी सी बस्ती में,
होली में भांग हो बटी.

परमीत सिंह धुरंधर

वो रानी


दो तेरी पलकें वो रानी,
दो ही मेरे ख़्वाब हैं.
छोटे से इस आसमान का,
तू ही एक चाँद है.
दो तेरे नखरे वो रानी,
दो ही मेरे अरमान हैं,
इस छोटी सी सल्तनत की,
तू ही एक तख्तो-ताज है.

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


उनकी उम्र की खबर तो सारे जमाने को हैं,
मेरा दर्द कोई तौल दे तो जाने.
उनके आँचल से तो ख़्वाब सब बुनते हैं,
मेरा ख़्वाब तौल दो तो समझें.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम इश्क़ तुमसे करते रहें, और शिकायत खुद से.
तुम्हारी बेवफाई पे भी, हम अपनी वफ़ा ढोते रहें.

परमीत सिंह धुरंधर

बीमार – सास


पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
मायका से आईल बा चिठ्ठी,
घरे बुलावाव तारी माई।
लिखदअ बालम तनी ई जवाब,
बीमार बारी सास हमार।
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
पायल छनकअता रात- रात भर,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।
टूट गइल शर्म के सारा दीवार,
बालम अइसन बा तहार ई प्यार।

परमीत सिंह धुरंधर

फितरत


कहती है दरिया उछाल कर,
किनारों के टूटने में हैं आनंद.
कब तक मुझे बांधोगे,
अपने बंधन में यूँ रख कर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.
आई हूँ मैं इठलाकर,
जाऊंगीं मैं बलखाकर.
मेरी तो ये ही फितरत है,
सब कुछ ले जाऊंगीं बहाकर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.

परमीत सिंह धुरंधर

बुद्धिजीवियों की कलम


औरत को देखा मैंने,
बाजार में बिकते हुए.
परुषों को देखा,
उसको खरीदते और नोचते हुए.
दिल मेरा भी भर उठा,
इन परुषों के खिलाफ।
तभी मैंने देखा, एक औरत को,
हँसते और रुपयों को दबाते हुए.
उत्तर से दक्षिण,
पूरब से पश्छिम,
भारत घूम कर लौटा।
कहीं भी न मिला,
ठाकुरों का जुल्म,
न दलितों का शोषण।
तब से उलझन में डूबा है दिल,
क्यों, बुद्धिजीवियों की कलम,
इस बोझ से दबी हैं?
क्यों, उनका लेख अब भी,
समानता के नाम पे,
ये जहर उगलती है?
क्यों, याद हैं उन्हें?
आज भी, गोडसे की गोली,
और गांधी की शहदात।
और भूल गए वो,
गुरु अर्जुन देव पे,
जहांगीर की वो क़यामत।

परमीत सिंह धुरंधर