परिंदे


गुलशन में इतने हैं परिंदे,
क्या हैं ये सब जिन्दे?
साँसे तो चल रही हैं हवाओं की तरह,
मगर,
क्या इन हवाओं में, अब भी फूल हैं खिलते?

परमीत सिंह धुरंधर

बिखरा-बिखरा


तुम जब से छोड़ गए,
दिल टुटा – टुटा रहता हैं.
ये मत पूछ की मैं क्या हूँ,
मेरा सब बिखरा-बिखरा रहता है.

परमीत सिंह धुरंधर

चाय का प्याला हूँ


प्यासा, प्यासा, प्यासा, प्यासा हूँ,
तेरी चाहत में एक तमाशा हूँ.
गैरत मेरी, तो कब की खो गयी,
अब तो बस, एक चाय का प्याला हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

आग बथान के


ललुआ भइल, भलुआ भइल,
पर बारु अभी भी कमाल के.
आव अ न रानी, खाल अ ना रानी,
मरई में, आज हमरा साथ में.
आँगना में त अ ओसा पड़ी,
आग ई ले जा, तू आज, बथान से.
पोता भइल, नाती भइल,
पर लागेलू अभी भी सोलह साल के.
आव अ न रानी, बैठ अ ना रानी,
कम्बल में पाँव डाल के.
आँगना में त अ ओसा पड़ी,
आग ई ले जा, तू आज, बथान से.

परमीत सिंह धुरंधर

तालाब पे – 2


पंडित विद्वान हो,
वेद में प्रकांड हो,
औरत, के लालच छूटे ना.
तनी दूर रही राजा जी,
बैर अभी ई टूटी ना.
भांग होली के,
योवन चोली में,
छुपाईला से, कभी छुपे ना.
एक बार नहा ल,
तालाब पे गोरी।
मौसम फिर अइसन, आई ना.

(She is not believing his love. He says that you would miss this love in your old age.)

परमीत सिंह धुरंधर

नाजायज खुशियाँ


तेरी आँखों से शिकायत,
हर आँख कर रही है.
तेरी खुशियाँ, इतनी है नाजायज,
की हर माँ रो रही है.
कब तक रौंदेगा तू,
यों लाखो जिंदगी,
हर तरफ से अब एक ही,
ये आवाज आ रही है.
ढूंढता है जिसे तू यूँ,
दर-दर पे भटक के,
वो खुदा की नजर भी कोई,
अब रहनुमा ढूंढ रही है.

परमीत सिंह धुरंधर

तालाब पे


गोरी देहात के,
आटा जाँत के,
छूटे न मुह से.
तनी दूर रही राजा जी,
बैर अभी ई टूटी ना.
बोली हजाम के,
घोड़ी लगाम पे,
रोकलो कोई से, रुकी ना.
एक बार नहा ल,
तालाब पे गोरी।
मौसम फिर अइसन, आई ना.

(She is not believing his love. He says that you would miss this love in your old age.)

परमीत सिंह धुरंधर

झुमका ला दीं


झुमका ला दीं, हँसुली ला दीं,
तनी बोलअ ना रानी, हंस के.
रोटी बनैले बानी,
तहरे खातिर घी घस के.
दिल्ली घुमा दीं, बॉम्बे घुमा दीं,
तनी बैठअ ना रानी, सट के.
छोड़ के बथान, तहरे खातिर,
खटिया डल्ले बानी आज घर में.
पैर दबा दीं, हाथ दबा दीं,
तनी आवअ ना रानी, सज के.
मूड बनैले बानी तहरा खातिर,
आज रम से.

परमीत सिंह धुरंधर

दिया


बदलते वक़्त ने हँसना सीखा दिया!
हँसते वक़्त ने बदलना सीखा दिया…..
और ऐसा है साथ मेरे दोस्तों का
अंधेरों में हर दिया जला दिया.

by my one well wisher

कभी फिर


तुम ऐसे मिले मुझसे,
की नजरे हटी न कभी फिर.
तन्हा-तन्हा सा रहता हूँ,
नींदे आयीं न कभी फिर.
अच्छा है की हम्मे ये दूरी है,
मेरी भी मज़बूरी है.
तुम जो अपने पास होते,
हम सो न पाते कभी फिर.

परमीत सिंह धुरंधर