बहुत तेरी यादें आती हैं पिता


बहुत तेरी यादें आती हैं पिता,
राहें जितनी काली, उतनी ज्यादा।
मन तो करता हैं, सब तोड़ के रख दूँ,
पर फिर, अकेला पर जाता हूँ पिता।
ठोकरों में गिरता ही हूँ रहा,
ठोकरों में गिर ही मैं रहा.
जख्मों पे जब भी मलहम लगता हूँ मैं,
आँखों में तुम ही छलक आते हो पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

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