महिला दिवस


महिला दिवस के दिन हर एक पुत्र को अपने पिता को नमन करना चाहिए, जिन्होंने उसके जीवन में  ममतामयी माँ और प्यारी बहनों का प्यार दिया.

परमीत सिंह धुरंधर

विद्रोही और प्रेम


विद्रोहियों की कोई जात नहीं होती,
इनकी कोई विसात भी नहीं होती।
पर बैठ नहीं सकते ये चैन से,
किसी भी परिस्थिति में,
इनको चैन नहीं मिलती।
अगर रोकना हैं इनको,
तो आप इनको मोहब्बत करा दो.
क्यों की वहीँ,
इनसे कोई विद्रोह नहीं होती।
उलझ के रह जाते हैं,
अपने ही दिल-दिमाग के जाल में.
भूख के खिलाफ लड़ने वाले,
विद्रोही की प्रेम में कोई औकात नहीं होती।
सिर्फ पुष्पों, सिद्धांतों, और नारी-सम्मान पे बोल के,
भारतीय नारियों का दिल नहीं जीता जा सकता।
और इनके जेब से,
सोने-चांदी के तोहफे खरीदी नहीं जाती।
तभी तो कोई स्त्री, किसी विद्रोही से प्रेम नहीं करती।
आवाज धीरे -धीरे कम हो जाती है,
घुट-घुट कर वो खुद से ही,
हतास-निराश  हो जाती हैं.
और फिर एक दिन,
किसी अनजान से मोड़ पे,
विद्रोही के प्राण ही विद्रोह कर देते हैं.
लावारिस, अंजाना,
ना कोई देखने वाला, ना पहचानेवाला,
और अंत में इस तरह, एक विद्रोही की आवाज,
अनंत में सम्मिलित हो जाता है,
उदासी और हार के आवरण में ढक कर.
और समाज फिर चल पड़ता है,
उस विद्रोही की भुला कर.
और वो नाचने लगती हैं,
रईसो के दरबार में.
जिन बेड़ियों को तोड़ने के लिए,
जीवन भर विद्रोही ने विद्रोह किया।
उन्ही को अपने गोरे और नाजुक पावों में,
घुंघरू बना कर.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता-पुत्र की जोड़ी


वो पिता-पुत्र की जोड़ी,
बड़ी अलबेली दोस्तों।
एक अर्जुन,
एक अभिमन्युं दोस्तों।
एक ने रौंदा था,
भीष्म को रण में.
एक ने कुरुक्षेत्र में,
कर्ण-द्रोण को दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत तेरी यादें आती हैं पिता


बहुत तेरी यादें आती हैं पिता,
राहें जितनी काली, उतनी ज्यादा।
मन तो करता हैं, सब तोड़ के रख दूँ,
पर फिर, अकेला पर जाता हूँ पिता।
ठोकरों में गिरता ही हूँ रहा,
ठोकरों में गिर ही मैं रहा.
जख्मों पे जब भी मलहम लगता हूँ मैं,
आँखों में तुम ही छलक आते हो पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

चुम्बन : दांतों का खेल


वो एक कातिलाना,
अंदाज रखती हैं,
मेरे लहू की,
एक प्यास रखती हैं.
लोग कहते हैं जिसे मोहब्बत,
उस शम्रो-हया के पीछे जाने,
वो क्या -क्या ख़्वाब रखती हैं.
वो टकराती हैं राहों में,
अपना दुप्पट्टा लहरा के.
हम अपनी नजरे झुका के चलें,
तो भी शरीफ नहीं।
अपनी शराफत के पीछे जाने,
वो कैसे-कैसे नकाब रखती हैं.
दांतों का खेल है,
चुम्बन मोहब्बत में,
तभी तो बुड्ढों पे वो,
खिलखिला के हंसती हैं.
हम जैसे जवानों की जल रही है,
हसरते कुवारीं।
और ओठों की अपने ही दाँतो से,
वो दबा के रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Kissing your partner has no meaning if your teeth are not involved in that.