जय श्री राम


बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.
जिसके एक ही नाम से,
पत्थर तक जुड़ गए.
सागर की लहरों को मथ के,
किनारों को जोड़ गए.
जहाँ सूझे ना,
कुछ भी आकर,
वहाँ काम आती है बस,
राम-नाम की युक्ति.
बस छूकर अहिल्या को.
पत्थर की मूरत से,
नारी-रूप दिया.
चखकर जूठे बेरों को,
भील सबरी को,
माँ का सुख दिया.
जग में कभी नहीं है,
प्रेम से बड़ी कोई शक्ति.
बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर

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