जहाँ राम की हो गयीं जानकी


जहाँ बुध हुए, महावीर हुए,
और दुनिया को मिली शान्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गंगा बहतीं, गंगा उमरती,
और राम की हो गयीं जानकी.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुरु मिले, गोबिंद मिले,
और मिल जाए सबको मुक्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुप्त हुए, मौर्य हुए,
और बूढ़े कुँवर ने खडग उठा ली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ दिनकर हुए, नेपाली हुए,
और बाबा नागार्जुन ने पहनी,
विद्रोह की चोली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.

परमीत सिंह धुरंधर

माई के दुलारी पिया के आस में


धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
गावं – गावं उमरत नदी रहली जे,
आज उनकर कोठारी में पड़ाव भइल बा.
भूख मिटल, प्यास छुटल, देखत – देखत,
बाबुल के आँगन के चिड़िया उड़ गइल बा.
एगो हल्दिया, अइसन मिलल रे,
तन पे चढ़ल, आ मन रंगल रे.
काजल फीका पड़ल, गजरा फीका पड़ल,
देखत – देखत, दर्पण भी सौतन भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.
माई के दुलारी पिया के आस में,
जल अ तारी चिपरी जैसे आग में.
नाज – नखरा रखस योवन पे जे,
उनकर अपने अंग – अंग से अब बैर भइल बा.
धीरे – धीरे मनवा विभोर भइल बा,
हल्दी चढ़त, रंग निखर गइल बा.

परमीत सिंह धुरंधर

रस


मैं रौंदत्ता हूँ और मैं रौंदूँगा,
मुझे जीत – हार का भय नहीं।
युद्ध किया है और करता रहूँगा,
मुझे विध्वंश का डर नहीं।
मैं नदिया नहीं जो राहे मोड़ लूँ,
न सागर हूँ, जो किनारों से बांध जाऊं।
रस पीया है, रस पियूँगा,
मैं भौरां हूँ,
मुझे कैद से भय नहीं।
बादलो का काम हैं सींचना,
काटें खिलें या फूल,
उससे उनको प्रेम नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

बिहार इतना विकसित हो


बिहार इतना विकसित हो,
दूर-दूर तक यूँ ही पुष्प पुलकित हों.
यूँ ही भ्रमरों का गुंजन हो,
यूँ ही फूलों से रसपान हो.
यूँ ही माँ के आँचल में,
लालों का चतुर्मुखी समृद्धि हो.
उंच-नीच भुला के,
इस वृक्ष की हर शाखा का,
हर दिशा में वृद्धि हो.

परमीत सिंह धुरंधर

सौतनें


कहीं दुपट्टा लपेटते – लपेटते,
वो परायी हो गयीं.
कहीं कंचे खेलते – खेलते,
हम जवान हो गए.
वो जब तक लौटीं,
अपने दो बच्चों के संग.
हम भी किसी के,
शौहर हो गए.
कभी काजल की डिबिया,
दिया था जो स्कूल में,
उनकी आँखों का रंग देख कर.
आज उसी को लगाती हैं,
मेरी बेगम की आँखों में,
उनकी दिलो-जान बन कर.
की बांटती है हर,
सुख-दुःख, दर्द की बातें.
बस वो ही एक राज,
अपने सीने में रख कर.
कौन कहता है की,
सौतनें, बहने नहीं होतीं.
बस रात के सफर में,
कभी साथ नहीं होतीं.

परमीत सिंह धुरंधर

हिन्दुस्तान


हिन्दुस्तान के धरती पे,
हैं फैसलें दिलों के.
कहीं माँ है गाती लोरी,
कहीं बहन खड़ी है राखी लेके.
कहीं पिता को इंतज़ार है,
पुत्र के लौटने का.
कहीं रखती हैं जला के दिया,
कोई आज भी उनकी यादों का.
कहीं दुपट्टा लपेटते -लपेटते,
वो परायीं हो गयीं.
कही पतंगों के पेंच पे,
वो मेहँदी लूटा गयीं.
कहीं बैलों संग बहते हैं,
अपना सब कुछ भुला के.
कहीं फसलों के संग ही,
काट जाती हैं जवानी की रातें.
कहीं मोहल्ले – मोहल्ले,
हम पीछे – पीछे भागे।
कहीं बुर्के के अंदर से भी,
दिखतीं है वो मुस्कराते।
हिन्दुस्तान के धरती पे,
हैं फैसलें दिलों के.
डोली तो सैकड़ों उठाई,
पर हर बार,
भीगीं है कहार की आँखे.

परमीत सिंह धुरंधर

हम फिर भी लड़ेंगे काश्मीर के लिए


ये धर्म रहे,
या फिर ये धर्म न रहे.
कोई योगा करे,
या फिर योगा ना करे.
हम फिर भी लड़ेंगे काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
कोई राम की पूजा करे,
या फिर पूजा न करे.
कोई गंगा में नहाये,
या फिर ना नहाये.
हम फिर भी सर कटाएंगे काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
यहाँ हिन्दू रहें,
या फिर मुस्लिम रहें.
चाहे इस धरती पे,
सिक्ख-बौद्ध ही खेलें.
हम फिर भी लुटाएंगे,
सब कुछ अपना काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.
हम आपस में चाहे लड़ें,
या फिर न लड़ें.
हममें प्रेम हो,
या फिर ना हो.
हम फिर भी एक हो कर,
खून बहायेंगे अपना काश्मीर के लिए,
क्यों की ये बना है,
सिर्फ मेरे हिन्दुस्तान के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बकलोल बैल


बैल, सैया हमार,
बकलोल रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.
लाख मन के योवन,
चोलिये में रह गइल.
सैया बथान में,
पुआल देखे रे.
देवरानी दही पे,
रोज छाली चखे.
नन्दी घूम-घूम के,
गावं में दावँ मारे रे.
जलअता योवन हमार,
चूल्हे की आंच पे.
सैया दुआर पे,
तास खेले रे.
सखी हमार भाग,
फुटल मिलल रे.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम-1


जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.
जब छूट गए अपने,
कोसों दूर.
सत्य की लड़ाई में,
भील, रीक्ष और बानरों ने,
संग युद्ध किया.
जब – जब सत्ता ने,
संहार किया.
मौन हुए जब वेद-पाठी,
और देव-गण.
एक नारी के संघर्ष में,
पक्षियों (जटायुं) ने,
युद्ध आरम्भ किया.
जग को सिखला गए प्रभु,
राम-रूप में,
सत्य की राह पे मानव ने,
भगवान से बढ़के काम किया.
जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम


बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.
जिसके एक ही नाम से,
पत्थर तक जुड़ गए.
सागर की लहरों को मथ के,
किनारों को जोड़ गए.
जहाँ सूझे ना,
कुछ भी आकर,
वहाँ काम आती है बस,
राम-नाम की युक्ति.
बस छूकर अहिल्या को.
पत्थर की मूरत से,
नारी-रूप दिया.
चखकर जूठे बेरों को,
भील सबरी को,
माँ का सुख दिया.
जग में कभी नहीं है,
प्रेम से बड़ी कोई शक्ति.
बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर