उजड़ा हुआ गुलिस्ता मुझे दे दो,
फूल खिला कर उनमे लौटा दूंगा।
मेरा दर्द तुम सकझते नहीं हो,
जवानी है कुछ कर जाऊँगा।
तुम थक कर, हार कर,
सत्ता के सिहासन से चिपके हो,
मैंने हल थामा है, जवानी की मस्ती में।
तुम काँटों पे कांटे बिछा लो,
मैं उनपे राहें बना लूंगा।
मेरा दर्द तुम सकझते नहीं हो,
जवानी है कुछ कर जाऊँगा।
परमीत सिंह धुरंधर