कर्म ही जीवन,
कर्म ही साधन।
कर्म ही,
मानव का संसाधन।
कर्म ही साँसे,
कर्म ही आँखें।
कर्म से ही,
मानव का भाग्योदय।
कंटीले पथ पे,
कर्म ही राही।
मृत्यु-शैया पे,
कर्म ही साथी।
कर्म ही पुण्य,
कर्म ही पाप.
कर्म ही,
मानव का लाभ.
कर्म ही वेद-पुराण,
कर्म ही गुरु-ज्ञान,
कर्म ही,
मानव का अभिमान।
कर्म से बंधे है सभी,
कर्म से उठे, और मिटे है सभी.
कर्म से ही, सजा,
ये कुरुक्षेत्र है.
इस कुरुक्षेत्र में भी,
सबमे भेद, बस उनका कर्म है.
परमीत सिंह धुरंधर