मीरा


मुझे श्याम ऐसा मिला,
मैं राम भूल गयी.
मन तो मेरा सीता सा,
पर तन से मीरा बन गयी.
धागों के रिश्ते नहीं बाँध सके,
मेरे पावों को.
मैं हर रिश्ता छोड़ के,
जोगन बन गयी.

परमीत सिंह धुरंधर