माँ का इरादा है,
की मुझको सवारें।
माँ का इरादा है,
की मुझको खिलाये।
माँ की आँखों की,
बस ज्योति मैं ही हूँ.
माँ ने अपनी आँखों का टीका,
बस मुझको ही लगाया है.
फिर कैसे तेरे योवन पे,
अपनी माँ को भुला दूँ.
माँ ने,
मेरे लिए चुल्ल्हा जलाया है,
माँ ने मेरे लिए,
रात के तीन बजे पुआ पकाया है.
अपनी हाथों को जलाकर,
मुस्कराकर, माँ ने मुझे,
भर पेट खिलाया है।
फिर कैसे तेरे अंगों पे,
माँ के छाले भुला दूँ.
ए हुस्न,
मेरी हसरत नहीं,
तुझको पाने की.
वो नासमझ थे,
जिन्होंने तेरी मोहब्बत में,
आसूं बहाएं।
मैं उन सितारों में नहीं,
जो अंधेरों में छोड़कर माँ को,
बस तेरा आँचल सजाए।
परमीत सिंह धुरंधर