यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।
परमीत सिंह धुरंधर
वक्षों से ढलकता है,
आँचल,
हर एक पल में.
बिना हवाओं के.
और वो शिकायत करती हैं,
मुझसे की,
मेरी नजरें वहीँ हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
पालतू कुत्तों की एक भीड़ खड़ी है,
फिर भी हुस्न वाले कहते है,
पुरुष अहंकारी बहुत है.
जाने कैसे लिखते है वो दोहे,
मेरी कलम ने,
तो बस एक सच्चाई लिखी है.
परमीत सिंह धुरंधर
कलेजा चीर देहलू तू ऐसे मुस्का के,
अब धोती मत फाड़ दअ, देह – से देह लगाके।
सारा थाती चल गइल,
ई दाल 250 रुपया किलो खरीदे में,
अब साड़ी मत मांगे लगियह,
करवा – चौथ आ दिवाली तू बता के.
परमीत सिंह धुरंधर
वो दिवाली भी अकेली थी,
ये दिवाली भी अकेली गुजरी है.
तुम न होती जो ज्वाला गुट्टा,
तो जिंदगी की हर दिवाली अधूरी है.
परमीत सिंह धुरंधर
सारे रिश्ते खामोस हो गए,
हम किसी राह पे,
वो किसी राह के मुसाफिर हो गए.
न कोई खबर, न इल्तिजा,
हम तो तन्हा ही हैं,
पर सुना है,
उनके लाखों रिश्तेदार हो गए.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं दीवाना बहुत था जिन नजरों पे,
वो कातिल बड़ी थी अदाओं से.
मैं ज्यूँ – ज्यूँ उनके नजदीक आता गया,
वो पकड़ती गयीं मुझे हर नब्ज से.
मैं जन्नत समझ के जिसे रुक गया.
वो इतरा -इतरा के फिर,
रखने लगी मुझे ठोकरों में.
मैं सह गया हर सितम जिसकी मोहब्बत में,
उसने करवा-चौथ रखा किसी और के नाम में.
परमीत सिंह धुरंधर
किस्मत से बड़ी है मेहनत,
मेहनत से बड़ा है जज्बा।
हम हारकर भी न बैठेंगे,
ये कह रहा हैं सांगा।
हम लड़ते रहेंगे,
हम बढ़ते रहेंगे।
किस्मत बदले या न बदले,
रुख नहीं बदलेगा ये सांगा।
बंधना मुझे स्वीकार नहीं,
और झुकना मेरा स्वाभिमान नहीं।
जब तक न मिलेगी मंजिल,
यूँ ही भटकता रहेगा सांगा।
मेरा हौसला मेरे साथ है,
कोई साथ आये या नहीं।
मोहब्बत मुझे है यूँ हिन्द से,
की अकेला भिड़ता रहेगा दुश्मनों से सांगा।
परमीत सिंह धुरंधर
If you cannot be a word in a sentence, try to be a comma or a full stop. However, do not be a part of substitution.
Parmit Singh Dhurandhar
क्या लिखूं तेरे हुस्न पे मेरी जान,
जब से देखा है बेचने लगा हूँ,
250 रूपये किलो दाल.
अब तो सोच लिया है,
फिर से शुरू करूंगा खेती।
बादलों ने भी संदेसा भेजा है,
खूब बरसेंगे मेरी खेतो में,
अब जो रोपूंगा धान.
क्या लिखूं तेरे हुस्न पे मेरी जान,
जब से देखा है बेचने लगा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर