रातों में यहाँ कंगन खनकते बहुत हैं


हुस्न सजता बहुत है, रंग और पोशाकों में,
पर उसके दामन में वेवफाई के दाग बहुत है.
वो कहते हैं बार – बार चिल्ल्ला कर,
राम – गौतम बुध की गलतियां।
मैं जब कहता हूँ आम्रपाली – मेनका,
तो वो बैठते, चुप बहुत हैं.
सिर्फ तबाही नहीं होती गोली और बारूदों से,
मोहब्बत में मिटे बेटे पे चित्कारती यहाँ माँ बहुत हैं.
कोई आँखों में काजल लगा के ये न कहे की शर्म है,
रातों में यहाँ, आज भी कंगन खनकते बहुत हैं.
बहुत देखा है मैंने हुस्न वालो का चरित्र,
यहाँ खूबसूरत चेहरों के पीछे छल बहुत हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चोली तहार अब दू गो हाथ मांग अ ता


धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
ऐसे मत बाँध अ अंचरा के कमर से,
ढोरी पे तहार कौआ दावँ मार अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
भीगल तहार चोली में बाढ़ आइल बा,
छोटी सी पोखरा में ज्वार आइल बा.
ऐसे मत खोंस अ साया ऊपर करके,
कछुआ भी देख अ आँख मार अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
मत जलाव अ अपना जवानी के तू,
ऐसे दिन-रात एक प्राण के खातिर।
कभी सुस्ता भी ल बथानी में हमारा,
की खटिया हमार अब दू गो देह मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
लचकत तहार कमरिया पगडण्डी में,
अरे मुखिया के घर तक भूचाल मार अ ता.
कब तक रख बू बाँध – बाँध के,
की चोली तहार अब दू गो हाथ मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
आव अ बैठ अ पास तनी,
तहार रूप अब हमार साथ मांग अ ता.
रखें तहारा के आपन बनाके,
तहार अंग – अंग अब हल्दी के रंग मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.

 

परमीत सिंह धुरंधर