बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।
परमीत सिंह धुरंधर