सागर और आवारापन


वसूलों में बंध के सागर भी खरा बन गया. मीठा बंनने के लिए आवारापन जरुरी है दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जिंदगी छोटी ही सही, मगर खोटी नहीं होनी चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अधूरी तमन्नाएं


अधूरी तमन्नाएं विवस करती हैं जीने के लिए, मारने के लिए और राहों को समतल बनाने के लिए. इसलिए मंजिलों की लालसा से ज्यादा महत्वपूर्ण है ये अधूरी तमन्नाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अनुभवहीनता


अनुभवहीनता, पराधीनता से ज्यादा आवश्यक और महत्वपूर्ण है, जीवन, समाज और मानव के विकास के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रसोई सम्भालूँ क्या?


तेरे मस्त -मस्त आँखों से,
कुछ ख्वाब चुरा लूँ क्या?
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
रसोई सम्भालूँ क्या?
तेरे ओठों को पीने की,
रोज -रोज चढ़ी रहती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
चूल्हा जला दूँ क्या?
कंघी तेरी जुल्फों से,
जब बूंदों को छानती है.
गीली साड़ी में तू,
सुलगती गैंठी सी लगती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
सारे कपड़े धो डालूं क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मांसपेशियां कभी – कभी अकड़ जाती है


मौसम को सम्भाल मेरे दोस्त,
ओठों से कुछ ज्यादा ही,
बढ़ रही हैं तेरे नजदीकियां।
थके, हारे, गिरे इस मर्द पे,
ना कर तू ऐसी मेहरबानियाँ।
मैं भी कभी शिकारी था, मगर,
आँखों की रौशनी, अब कुछ धुंधली है,
मांसपेशियां भी कभी – कभी अकड़ जाती है.
तो ना बिछा यूँ मुझपे, रोज – रोज,
शतरंज की बाजियां।
क्योंकि,
दिमाग अब भी वो ही शातिर है,
तो ए दोस्त,
न जगा इसे, यूँ गिरा – गिरा के बिजलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बन दिया,
मजनू बनने चला था, ग़ालिब बना दिया।
हुस्न वालो की शहर में होता है,
चर्चा मेरा एक बेवकूफ के रूप में.
क्यों की मैंने उनको,
उन्हीं का आइना दिखा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तीनो बदमाश एक साथ है


एक है खत्री, और एक आफताब है,
दोनों के आँखों में मेरा ही ख्वाब हैं.
तो कैसे सम्भालूँ जोबन रसिया,
Crassa के मुंह से भी टपकsता लार है.
एक ही बार में टूट जाते है,
चोली के सारे बटन मेरे.
ऐसा इनकी आँखों का कमाल है.
तो कैसे सम्भालूँ चुनर रसिया,
जब तीनो बदमाश एक साथ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सोचता हूँ


कब तक दूसरों के चिराग से काम चलाऊ,
सोचता हूँ अब अपना दिया जला ही लूँ.
गम नहीं है जिंदगी यूँ ही अकेले अंधेरों में,
सोचता हूँ इन दीवारों को भी थोड़ी रौशनी दिखा हीं दूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आईने में उनको सजते – सवरते


उम्र के फैसले बदल – बदल कर,
निगाहों से देखतें हैं तरस -तरस कर.
आईने में उनको सजते – सवरते,
गलियों में उनको निकलते- मचलते।
मोहब्बत का दर्द सहते – सहते,
देखते हैं गैरों को बस्ते यहाँ।
दंश बेवफाई का कुछ ऐसे मिला की,
जीवन रह गया हाथ मलते – मलते।

 

परमीत सिंह धुरंधर