माँ तो दबंग है,
माँ तो दबंग है,
मास्टर जी.
कहती है, खा लो,
थोड़ा तो खा लो.
छोड़ो पढाई,
मास्टर जी.
चाहे आँगन में,
या रहूँ बथान में.
आ जाती है,
लेके पकवान हाथ में.
फिर कैसे मैं पढूं?
क्या करूँ पढाई?
मास्टर जी.
मास्टर जी भी कांप गए,
लेके छड़ी हाथ में.
बोले, कोई बात नहीं बेटा,
माँ तो सर्वोपरि है.
खा – खा के करो पढाई।
परमीत सिंह धुरंधर