जंग


जंग कभी सितारों में नहीं होती,
जब की चाँद केवल एक है.
क्यों की उनको पता है,
चाँद सिर्फ बेवफा होता है.
जंग पतंगों में भी नहीं होती,
जब की शमा भी केवल एक है.
क्यों की उनको भी पता है,
इश्क़ में मरना सिर्फ पतंगों को है.
जंग तो भौरों में भी नहीं होती,
कलियों के रास को लेकर।
क्यों की भौरें जानते हैं,
साँझ होते ही कालिया,
वफ़ा – महब्बत सब भूल जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उम्मीदों का पत्र


पद और पुरस्कार,
कुछ नहीं,
मेरे दिव्य ललाट के समक्ष।
चाहत तो बिलकुल नहीं,
इस जग में अपने लिए,
इस कलम के समक्ष।
जिस समूह में हर इंसान,
विभूषित है साहित्यकार बन कर.
मैं अपनी उम्मीदों का पत्र,
कैसे रखूं उन विकृत विद्वानों के समक्ष।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हिंदी दिवस और खत्री को प्रेम निवेदन


हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पे दोस्तों ने पकड़ लिया. सब हंस कर कहने लगे तो भाई कुछ करोगे की नहीं हिंदी के सम्मान में.
मैंने कहा, “हम क्या कर सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा किसी को अपना प्रेम निवेदन कर सकते हैं हिंदी में.”
हमने कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की अरुणा खत्री को कॉलेज के गेट पर ही सुबह – सुबह घेर लिया। अरुणा खत्री सुन्दर, तेज, हाजिर जबाब के साथ – साथ शातिर और चालक थी. बाज की नजर और खत्री की नजर से कबूतर से लेकर कॉलेज के लड़के तक डरते थे. ऐसे में वहाँ तुरंत भीड़ लग गयी की भाई किसकी इतनी हिम्मत की खत्री को पकड़ लिया, वो भी वैलेंटाइन डे पे नहीं पकड़ के हिंदी दिवस पे.  बहुत बिनती करने, पैर पकड़ने पे भी खत्री का दिल नहीं पसीजा। अंत में पता नहीं खत्री को क्या हुआ. वो थोड़ी आवाज मीठी करके, आदाओं पे इठलाती हुई बोली, “क्यों तुम्हे स्वीकार करूँ मैं?” मैंने कहा, “मैं तुम्हे दिमाग से बहुत पसंद करता हूँ. मैं तुम्हे अपना दिमाग देना चाहता हूँ.” जीवन में पहली बार किसी ने आज दो साल में, कालेज में खत्री के दिमाग पे जोर डाल दिया था. उसने बोला, “क्या मतलब? लोग दिल देते हैं प्यार में और तुम दिमाग दोगे। कैसे?” मैंने कहा, “अपनी शादी हो गयी तो आपके बच्चों में दिमाग 5०% मेरा होगा।” उसने गुस्साते हुए कहा, “सिर्फ मेरे बच्चे, तुम्हारे नहीं।” मैंने कहा, “अरुणा, शादी के बाद तुम अदालत से बच्चों का हक़ नहीं मांगोगी, क्या तलाक के बाद? अगर तब उन्हें तुम अपना कहोगी तो आज क्यों नहीं?” खत्री ने आँखे तैराते हुए कहा की अब तो वो बिलकुल नहीं शादी करेगी उससे जो तलाक की बात करता है. मैं, ” अरे यार खत्री, ये गजब हैं लिविंग रिलेशन जब चाहे छोड़ दो पर तलाक को क्यों गलत मानते हो फिर. पर खत्री टस से मस ना हुई. अंत में हार कर मैंने कहा, “यार तो २5% दिमाग ले लो.” वो बोली, ” वो कैसे?”  मैंने कहा की अपने बच्चों की शादी करेंगे। पता नहीं उसको क्या जच गया, वो मान गयी. दोस्तों ने पूछा तो मैंने कह दिया उसने स्वीकार कर लिया मेरा प्रेम निवेदन की हम लोग शादी करेंगे। दोस्त बोले, “शादी!” मैंने कहा, “हाँ, वो तैयार है, हामरे बच्चों की शादी के लिए”. और सारे कॉलेज में ये बात फ़ैल गयी. इस तरह वो हिंदी दिवस, हंसी दिवस में बदल गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

JNU की चार दीवारें


दम्भ नहीं,
अडिग विश्वास है,
पराजित करूँगा।
सिर्फ JNU की चार दीवारें,
ही भारत नहीं,
काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत आबाद है.
जिंदगी के हर मैदान में,
मिटटी के हर प्रांगण में,
आज नहीं तो कल,
तुम्हे विस्थापित करूँगा.
ये अफवाह नहीं,
आरम्भ है.
यह भूचाल नहीं,
मेरा शंखनाद है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम फिर से कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे


हार जिंदगी का अंत नहीं।
हार अगली जीत का शुभारम्भ हैं.
वो जीत कर कोइसिस करेंगे खुद को बचाने की,
हम हार कर कोसिस करेंगे,
खुद को उठाने की,
लोगो को जगाने की.
वो जीत कर दम्भ करेंगे,
हम हार कर उठान करेंगे।
लोहिया को तोड़ न सके,
वो बार – बार हरा कर.
बोस को मिटा न सके,
वो जूठी अफवाहे उठा कर.
वो जीत कर सत्ता को प्राप्त करेंगे,
हम हार कर पुनः संघर्ष और प्रयास करेंगे।
जीत उनकी भी अमर नहीं,
और हार मेरी भी अटल नहीं।
हम फिर से इस कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे।
मेरे अंत तक इस सत्ता परिवर्तन,
को आवाहन करेंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो कैसे संभाले?


दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

सवाल


उस ने फिर मेरा हाल पुछा है कितना मुश्किल सवाल पुछा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं दिया जलाता रहूँगा


लड़ाई होगी,
जब तक आसमान मुझे मेरी जगह न दे दे.
मैं दिया जलाता रहूँगा,
हर अँधेरी राह में,
जब तक सूरज मेरे आँगन में अपनी किरण न बिखरा दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नजर


जवानी के तीर थे,
नजर को मशहूर कर गए.
जब – जब ढलका उनका आँचल,
शहर में सरे – आम, कत्ले – आम कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


सुबह तो हो जाती है तुम्हारी आँखों से,
ना जाने कब रात होगी तुम्हारी जुल्फों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर