भोले – भाले खत्री


मेरे सैयाँ छैल – छबीले,
दिखाते हैं खूब रोआब।
जब चाहे पकड़ लेते हैं,
मेरी पतली कमर,
चाहे धुप हो या हो छावँ।
मेरे सैयाँ बड़े सजीले,
रखते हैं खूब ध्यान।
थक जाऊं थोड़ा भी,
तो दबा देते है पैर – हाथ.
मेरे सैयाँ खूब नखरीले,
तुनक जाते हैं हर एक बात.
मैं पकाऊं मछली,
तो मांगते हैं वो मांस।
मेरे सैयाँ भोले – भाले,
खत्री उनका नाम.
खोल नहीं पाते,
एक बटन चोली का,
मेरी कैसी फूटी किस्मत राम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ओम पूरी


जो हो न सका,
अपनी बीबी का.
वो क्या होगा?
फिर माटी का.
अगर इतना ही,
ओम पूरी होते ज्ञानी।
तो लगाम न छुटता,
यूँ उनकी बाणी का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे सैंयाँ


मेरे सैंयाँ,
मार के गुलेलिया,
हर सांझ रे.
फांस ले,
चिड़ियाँ हर रात में.
मेरे सैयां,
बड़े शैतान रे.
खेलें,
ऐसे – ऐसे दावँ रात में,
सुखल रहेला,
प्राण हर सांस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा के मोहन


तुम्हारी नजर के हैं दीवाने सभी,
मेरी हर नजर में तुम्हीं हो तुम्हीं।
रुस्वा करो, तनहा रखो,
शिकवा कोई, कभी ना, कहीं।
अब इस जिंदगी में बस तुम्हीं हो तुम्हीं।
धूल में रहूँ, काँटों में रहूँ,
मुस्कराती रहूंगी, बस अपने चरण में रखो.
इस मीरा के अब मोहन तुम्हीं, तुम्हीं हो तुम्हीं।
एक विष सा है, ये सम्पूर्ण जीवन मेरा,
बनके प्रभु, अब इसकी लाज रखो.
हर अग्नि-परीक्षा, हंस कर दे दूंगी,
आजीवन, बस, तुम मेरे, केवल मेरे ही रहो.
की इस अबला सीता के,
अब राम बस, तुम्हीं हो तुम्हीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक फतह तो लिख


हार कर,
कहाँ छुप जाऊं,
ये तो बता दे खुदा।
रुसवाई है, तन्हाई है,
उसपर हैं,
ये शिकस्त की बेड़ियाँ।
मुझे उनके सर पे,
ताज का गम नहीं।
पर इस जंग में,
एक फतह तो लिख,
मेरे नाम पे खुदा।
बेवफाई है, महंगाई है,
उसपर हर तरफ,
खनकती हैं चूड़ियां।
मुझे उनकी डोली उठने,
का गम नहीं।
पर इस प्रेम में,
एक रात तो लिख,
मेरे नाम में खुदा।
आवारा हूँ, बंजारा हूँ,
उसपर मंजिलों से मिटती नहीं दूरियाँ।
मुझे अपनी, मात – पे – मात,
का गम नहीं।
पर इस खेल में,
कभी तो मेरी भी शह,
लिख दे खुदा।
परमीत सिंह धुरंधर

छपरा से कटिहार तक


माँ ने कहा था बचपन में,
तुम लाल मेरे हो लाखों में.
तुम्हे पा कर मैं हर्षित हुई थी,
नाचे थे पिता तुम्हारे, जब आँगन में.
गोलिया चली थीं, तलवारे उठीं थी,
छपरा से कटिहार तक.
बाँट रहे थे सप्ताह – भर, रसोगुल्ला,
बड़े -पिता तुम्हारे, कोलकत्ता में।
दादी ने चुम्मा था माथा तुम्हारा,
गिड़ – गिड़ के पीपल पे.
दादा ने फुला के सीना,
खोल दिया था खलिहान, जन – जन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पुत्र मेरे, तुम नीलकंठ बनो


मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभिमन्यु – दुर्योधन संवाद


अभिमन्यु को देखकर दुर्योधन अट्टहास करता हुआ बोला, “अभी बालक हो, लौट जाओ. अभी तो तुमने जीवन में कुछ किया ही नहीं। तुम यूँ अपने जीवन को बेकार मत करो.”
अभिमन्यु ने सबको प्रणाम करने के बाद कहा,
” जीवन में मधुरता प्यार से हैं,
जीवन की प्रखरता कर्म से है,
मगर जीवन की महानता त्याग से है.
इन तीनो के बिना जीवन कुछ नहीं,
और जब जीवन नहीं तो फिर धर्म क्या?”
दुर्योधन ने कहा, “अगर जीवन प्रेम और त्याग है, तो क्या तुम्हे अपने बंधुओं से प्रेम नहीं? क्या तुम उनके जीवन के लिए ये सत्ता का त्याग नहीं कर सकते?”
अभिमन्यु, “प्रेम तो बहुत है. और हमने त्याग भी किया था. आज भी ये लड़ाई हम सत्ता के सुख के लिए नहीं लड़ रहे. अगर लड़ाई सत्ता के सुख की होती तो मैं इस कुरुक्षेत्र में नहीं खड़ा होता। यह हमारा संघर्ष है आपके अत्याचार के खिलाफ। यह संघर्ष है आपकी निरंकुशता के खिलाफ, आपके लोभ, और आपके दमन के खिलाफ।”
अभिमन्यु, “तात श्री, बिना संघर्ष का त्याग, त्याग नहीं; बिना संघर्ष के प्रेम, प्रेम नहीं और बिना संघर्ष के कर्म, कर्म नहीं। अथार्थ, मानव के जीवन की हर परिभाषा और उसकी जवानी बिना संघर्ष के कुछ नहीं। हमारी ये लड़ाई न तो सत्ता के लिए है, ना आपके दमन के लिए. ये हमारा संघर्ष है इस समाज से, जिसके आप चालाक और पालक हो. हम चाहते हैं की इसको बदल दे, और ये संघर्ष है उस बदलाव के लिए.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुख़ौटा


दिल जब टुटा तो समंदर भी छोटा हो गया,
हर रिश्ते पे मेरे एक मुख़ौटा आ गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अहिंसा परमो धर्म:


जब सारी दुनिया गाती है,
अहिंसा परमो धर्म:.
मैं तिब्बत – तिब्बत गाता हूँ,
अकेला रह जाता हूँ
भीड़ छट जाती है, धीरे – धीरे,
मैं अकेला ही गाता हूँ.
कम्युनिष्टय JNU के,
सारे मौन हो जाते हैं.
मूक – बधिर बन के, फिर वो
गांधी के बन्दर से बन जाते हैं.
जब कम्युनिष्टय JNU के चिल्लाते हैं,
फासीबाद से डरना नहीं।
तब मैं चंद्रशेखर -चंद्रशेखर चिल्लाता हूँ,
अकेला रह जाता हूँ.
आइसा-SFI सब भाग जाते हैं,
मैं अकेला ही चिल्लाता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर