चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.
तुम कहो तो बरस जाएँ,
तुम कहूं तो बिखर जाएँ।
तुम यूँ ही आगोस में रहो,
ग़मों के हर तूफ़ान को सह जाएँ।
चलो हम भी एक हो जाएँ,
तुम दिया बन लो,
हम बाटी बन लें.
अगर ये बंटवारा भी न मंजूर हो,
मोहब्बत का.
तो तुम सिलवट बन लो,
हम हल्दी बन लें.
चलो हम कोई गुनाह कर लें,
तुम चाँद बनों, हम कोई दाग ही बन लें.
अगर ये बंटवारा न हो मंजूर,
मोहब्बत में.
तो हम काली सी कोई घटा बन लें,
तुम चमकती-करकती बिजली ही बन लो.
परमीत सिंह धुरंधर