रामाश्रय सिंह : एक योद्धा


चिलचिलाती धुप हो,
या हो कड़कड़ाती सर्दी।
बैल उसके बहते रहते,
ना सुनी पड़ी,
कभी उसकी धरती।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
गड़ासे चले, कुल्हाड़ी चली,
कोर्ट में चले कितने मुक़दमे।
फिर भी बाँध ना सके उस अकेले को,
सौ -सौ, भी एक बार, मिल के.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
छपरा से कलकत्ता तक,
बस जिसके नाम की ही एक गूंज थी.
साभाओं -महासभाओं में जिसकी ही बस,
चली और बोलती थी.
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।
ज्ञानी इतना ज्ञान में, जिसका न कोई सानी,
रामायण – महाभारत के किस्से,
जिसने सुनाये मुझे मुहजाबानी।
गर्व है मुझे की मेरे नस – नस में,
दौड़ता रुधिर, है उस योद्धा की निशानी।
एक योद्धा था, एक योद्धा था,
रामाश्रय सिंह एक योद्धा था,
जिसके लिए रोई थी उसकी माटी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा घमंड


मुझको अपने बिहारीपन का कितना है घमंड,
मेरी साँसों में आज भी है बस छपरा का ही गंध.
रोज नहाता हूँ कर के हर -हर गंगे,
और खाता हूँ लिट्टी-चोखा कर के सर बुलंद।
ऐसी माटी फिर ना देखि, घूम ली पूरी दुनिया,
तभी तो इस माटी पे हुआ था बुद्ध -गोविन्द का संगम।
नहीं छोड़ेंगे अपनी इस बिहार की माटी को यारों,
आवन कसम खाएं, इसे संवारेंगे मिलकर फिर से हम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी


तुम रात भर बैठों मेरे पास आकर,
मैं दिनभर सपने देख के गुजारा कर लुंगी।
तुम बस मेरे साँसों को छू दिया करो इन ओठों से,
मैं हर खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ करो उससे


इश्क़ करो उससे,
जो तुमपे तंज कस दे.
वरना हुस्न तो सदा से बिछता रहा है,
क्रूर शासकों के नीचे।
वो घर बसा दें, या तुम्हे औलादें दे दें,
इसे उनकी मोहब्बत मत समझों।
कुछ तो उनकी भी जरूरतें हैं,
वरना वो यूँ तुम्हारे आगे खामोस नहीं रहते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पिता – पुत्र


ज्ञान – विज्ञान सब झूठ है,
सच्चा बस प्रेम है मेरा।
पुत्र तुम्हे पाने को,
मैंने खोया है कितने स्वप्न मेरा।
पुत्र तुम कर्तव्यगामी बनो,
बस यही होगा गर्व मेरा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

विभीषण – मेघनाथ


पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।
मैं अपनी तीरों से सृष्टि का संहार कर दूँ,
मुझे पिता के सिवा, कहीं कुछ भी दिखता नहीं।
तुम भूल गए भ्राता, कुल -संबंधी,
मैं इस जनम में ऐसा द्रोही तो नहीं।
काका श्री, तुम ज्ञानि हो समस्त वेदों को पढ़कर,
मगर मेरी नजरों में, ये पिता के चरणों की धूल भी नहीं।
मेरी जवानी चाहे मखमल पे फिसले,
मेरी जवानी चाहे काँटों पे बिखरे।
आखिरी क्षणों तक बस पिता से प्रेम करूँगा,
चाहे मोक्ष मिले या आत्मा भवसागर में भटके।
मेरी नजरों के सामने हो जाए लंका का पतन,
इस जीवन में ऐसा तो मेरे रहते होगा नहीं।
पिता से बढ़ के कोई परमात्मा नहीं,
इन चरणों के सिवा ये सर कहीं झुकता नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण-मेघनाथ


शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।
रण में रावण का आना तो बहुत दूर,
कोई मेघनाथ से पहले दो दावँ खेल के तो देखे।
इंद्रा को हरा के जो लौटा था मेरे पास,
प्रिये सुलोचना के लिए, जिसने दिया शेषनाग को पछाड़।
वो लहू है मेरा, कोई ललकार के तो देखे।
शेर बनाया हैं मैंने, कोई भीड़ के तो देखे।
ये लाल हैं मेरा, कोई इससे लड़ के तो देखे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत – मर्द


वो जो कल तक,
मेरी किस्मत बदलना चाहती थी,
अब अपना घर बदल रही हैं.
मर्द बस बदनाम हैं इस बाजार में,
गली – गली में औरत अपना बिस्तर,
बदल रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर