समुन्द्रों में अब तो, उठा दो लहरें,
तुम अब जावां हो गयी हो, बिखर दो ये जुल्फें।
तुम्हारा शर्माना माना की बहुत ही जायज है,
पर कभी तो बेशर्म बन कर, उठा दो ये पलकें।
कब तक काजल से ढकोगी खवाबों को सुला के,
कभी तो जिला दो इन्हें गिराके सब दीवारें।
परमीत सिंह धुरंधर