भारत की इस तपोभूमि पे,
मैं अपना तप दिखलाऊंगा।
तू बन के आ जा मेरी मेनका,
बरना मैं रावण सा तुम्हे हर जाऊँगा।
समझा दो तुम अपने पिता को,
की स्वीकार करे वो मुझको।
बरना मेघनाथ सा उनका तोड़ के दर्प,
तुम्हे बलपूर्वक अपनी भार्या बनाऊंगा।
तुम्हारे जिस्म से आती है उर्वशी की गंध,
मदहोस करती है मुझे,
जैसे मलय -पर्वत की पवन.
तुम मुझे अपना पुरुरवा मान,
मेरे ह्रदय को सिंचित करो.
या मैं इंद्रा सा,
तुम्हारे शील को भंग कर जाऊँगा।
अपने योवन के रस से,
मेरे रक्त को प्रवाहित करो.
इन केशुवों के भवर में,
मुझे हर क्षण समाहित करो.
तुम बन के शकुंतला,
मेरे बीज को अंकुरित करो.
या मैं विश्वामित्र सा तुम्हे,
बंजर पाषाण बना जाऊँगा।
परमीत सिंह धुरंधर