अभी अधरों को वक्षों पे लगाया था


अंग – अंग खिल कर,
हिमालय हो गए हैं.
वो कहती है,
की ये नाजुक बड़ी है.
अभी – अभी अधरों को,
वक्षों पे लगाया था.
और वो हैं की,
उनपे चोली कस रही हैं.
अभी सिलवट तक टूटी नहीं,
और चादर भी कोरा ही है.
मैंने जुल्फों को बस,
अभी छुआ ही तो था.
और वो हैं की अपनी,
चुनर समेटने लगीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आज अकेली पड़ गयी है, कंगना


भारत वर्ष जिसके आँगन में,
रविश कुमार, विनोद दुआ,
और लाखों नारी के अधिकार के लिए,
लड़ने वाले, वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत वर्ष, जहाँ हिन्दू धर्म, सवर्णों में,
हर पल नारी विरोधी कर्म, मर्म,
ढूंढने वाले,
सिंदूर, करवा चौथ को नारी के पावों की बेड़िया बताने वाले,
लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत बर्ष, जहाँ नारी से कैसे बाते करते है?
कैसे नारी का सम्मान करते है?
क्यों राम गलत थे जो सीता का त्याग किया?
जहाँ लाखों नारे लगाते हैं नारी की मुक्ति को,
जहाँ सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार,
रोज कहते हैं बात नारी सुरक्षा का,
जहाँ लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिव आप ही मेरी आत्मा


शिव आप ही मेरी आत्मा,
शिव आप ही हो मेरे परमात्मा।
शिव, आप को ही है मुझे पाना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
शिव, मुझे उद्दंड बना दो,
शिव, मुझमे घमंड भर दो.
पर सदा चरणों में अपने रखना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
धरती से आकाश तक, प्रलय मचा दूँ,
त्राहिमाम मचा दूँ,
हाहाकार मचा दूँ.
मुझे अमृत नहीं, आप सा विष ही है चखना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।
शिव आप ही मेरी आत्मा,
शिव आप ही हो मेरे परमात्मा।
शिव, आप को ही है मुझे पाना,
ये ही है मेरी कामना, ये ही है मेरी उपासना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

विष पीने की सनक है


हम बिहारियों की बातें,
ही कुछ अलग है.
कुछ भी नहीं है जीवन में,
पर घमंड बहुत है.
हम भगवान् शिव के ऐसे,
अनन्य भक्त हैं.
जिन्हे अमृत नहीं,
विष पीने की सनक है.
कितनों ने कोशिश की है,
हमें तोड़ने की.
वो जाने किस भीड़ में खो गए,
और हम आज भी अटल हैं.
कितनो ने हमें गवार कहा,
कितनो ने हमारा त्रिस्कार किया,
पर जीवन के संघर्ष में हम प्रथम है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर


ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर,
इंडिया को है तुमपे गर्व।
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर,
इंडिया को है तुमपे गर्व।
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर.

अब बेटी को बचाना है,
क्रिकेट उसको सीखना है,
हरमनप्रीत कौर बनाना है.
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर.
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर,
इंडिया को है तुमपे गर्व।

ऐसे खेलो अब फाइनल में,
बाट लगा दो इंग्लैंड के,
जो कर न सकी विराट -सेना,
तुम अकेले कर दो बल्ले से.
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर.
ओ हरमन – हरमनप्रीत कौर,
इंडिया को है तुमपे गर्व।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे जीवन का मूल -मंत्र


चिनाय सेठ, मैं शीशे के घर में इसलिए रहता हूँ की कोई पत्थर तो मारे, और फिर मैं उसके ऊपर पथरों की बरसात कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

 

जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा


वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिनकी उम्र गुजर गयी.
हमारी जवानी तो बंध कर रह गयी,
कालेज के उस दीवार से.
जिससे चिपक गयी थी वो सहम के,
या शायद शर्म से,
जब थमा था हमने उन्हें अपने बाँह में.
वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिन्होंने प्राप्त कर लिया महबूब के जिस्म को,
हमारी तो नजर टिकी रह गयी,
आज तक कालेज के उस दिवार पे.
जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा,
जब कसता था मैं उन्हें अपनी बाँह में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भी त्याग करूँ सर्वश्व अपना


आवो माँ,
करें उपासना शिव – शंकर की,
हम आज साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.
सर्वश्व त्याग कर जिसने,
सिर्फ एक कैलास को थाम लिया।
अमृत दे कर जग को सारा,
जिसने स्वयं विष-पान किया।
तो आवो माँ,
चरण पखारें शिव – शंकर की,
आज हम साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.
हर जन्म में पुत्र बनूँ मैं शिव का,
ये गोद मिला मुझे सौभाग्य से.
बन कर धुरंधर शिव सा,
मैं भी त्याग करूँ सर्वश्व अपना,
जग कल्याण में.
तो आवो माँ,
आशीष ले शिव-शंकर की,
हम आज साथ में.
पिता मेरे कितने भोले हैं?
रखते हैं सर्पों को भी साथ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई मिल जाए परमित सा


दर्पण भी झूठा हो गया है,
किस को अपना रूप दिखलाऊँ।
कोई मिल जाए परमित सा,
तो मैं भी इठलाऊँ।
अंग – अंग खिला है मेरा,
चुमुक बन के.
कोई मिल जाए परमित सा,
तो मैं भी चिपक लूँ.
उमरना चाहती हूँ, नदिया सी,
अपनी जवानी की अंगराई में.
कोई भर ले,
अपनी बाहों में परमित सा,
तो मैं भी बलखा लूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं चोली मेरी खुल गयी


दिले – नादानी में,
कई कहानी बन गयी.
कहीं चुनर मेरी ढलकी,
कहीं चोली मेरी खुल गयी.
किसी के निशाने पे थी मैं,
तो किसी के निशाने पे था दिल.
किस -किस को संभालती,
थी बड़ी मुश्किल।
नई-नवेली मेरी जवानी में,
कई कहानी बन गयी,
कहीं पायल मेरी टूटी,
कही मेरी कमर ही टूट गयी.
रस पी कर,
उड़ गए सारे ही भौरें।
मैं बनना चाही जिसकी,
वो सौतन मेरी ले आएं.
कच्ची पगडण्डी पे,
कई कहानी बन गयी.
कहीं तिजोरी मेरी लूटी,
कही मैं ही पूरी लूट गयी.

 

परमीत सिंह धुरंधर