कई चादर डाला हमने


हम उनकी खेतों में मजदुर बन के रह गए दोस्तों,
वो हुजूर बन गई, मेरी बेगम बनते – बनते दोस्तों।
कई चादर डाला हमने एक साथ औलियाओं – मजार पे,
वो बेच गई हमें, खुदा को ठगते – ठगते दोस्तों।
शर्मों – हया के पीछे, रखती हैं खंजर भी,
मौत मिली हमें ये राज खुलते -खुलते दोस्तों।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा खाट अभी तक कुंवारा है


तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.
तेरे हुस्न का चर्चा गली-गली में,
मेरे कुंवारेपन का ढिंढोरा है.
जगमग करते महल में,
तू सोती है दिया भुझा के,
मेरे जीवन में बस अँधियारा है.
चालीस में भी बलखाती है तू,
जाने किसको रिझाने को,
मेरे बुढ़ापे का अब तक ना कोई सहारा है.
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू माँ बन गयी चार बच्चों की


मैं आशिक़ हूँ तेरी नजरों का,
रहता हूँ मयखाने में,
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मैं बैठा हूँ बंजारों में.
जाने क्या मिल गया तुझे?
चंद लकीरें मिटा कर.
सोना – चाँदी से तन तेरा शोभे,
हम जुगनू बन रह गए अंधेरों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

I just need your strong biceps


You cannot be a man,
Until you hold my waist.
It does not mater,
How old you are?
I just need your strong biceps.
You cannot be a man,
Until you hold my waist.
All diamonds and rings,
I can scarify to be your dream.
It does not matter,
How poor you are?
I just need a strong house.

 

Parmit Singh Dhurandhar

खाने को कुछ स्वादिष्ट नहीं


मेरी मंजिलें,
हैं मुझे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?
अकेला, तन्हा,
चाहे दिन हो, या रात.
मुश्किलों में हैं,
हर एक साँस।
मेरी ख्वाइशें,
सब मुझसे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?
मिलने को कोई,
माशूक नहीं।
खाने को,
कुछ स्वादिष्ट नहीं।
मेरी हसरतें हैं,
मुझसे ही खफा.
जाने जिंदगी,
ये कैसा इम्तिहाँ?

 

परमीत सिंह धुरंधर

टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे


तुम्हारी जवानी का नशा ही ऐसा है प्रिये,
बस आँखों ने संभाला है मुझे।
टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे,
सावन भी उतर आया है जिसपे खेलने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते


कोई मिलता ही नहीं, जिसे अपना कह सके,
तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते।
किसको नहीं है शौक ओठों के जाम का,
बेबसी बन गयीं हैं ये जवानी की साँसे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न को समझना आ गया


मेरे अश्कों पे तुम्हे मुस्कुराना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
जिसकी सत्ता है, तुम शौक़ीन उसकी,
चंद सिक्कों पे, तुम्हे आँचल ढलकाना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
नियत तुम्हारी हमसे अच्छा कौन समझेगा?
जिसे दौलत की चमक पे थिरकना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
औरत को वफादार लिखने वालों की कलम,
पे मुझे शक है,
जिन्हे चार दीवारों के अंदर चादर बदलना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर