हम उनकी खेतों में मजदुर बन के रह गए दोस्तों,
वो हुजूर बन गई, मेरी बेगम बनते – बनते दोस्तों।
कई चादर डाला हमने एक साथ औलियाओं – मजार पे,
वो बेच गई हमें, खुदा को ठगते – ठगते दोस्तों।
शर्मों – हया के पीछे, रखती हैं खंजर भी,
मौत मिली हमें ये राज खुलते -खुलते दोस्तों।
परमीत सिंह धुरंधर