मेरी बीबी है बिहार की


मेरी बीबी है बिहार की,
बिस्तर पे भी रखती है,
घूँघट चार हाथ की.
चार – चार बच्चों की,
अम्मा बन गयी.
पर मैं देख ना पाया,
आज तक तिल उसके नाक की.
मेरी बीबी है बिहार की.

केश ही नहीं, जिस्म पे भी,
लगा लेती है रातों को, करुआ तेल.
चुम्बन की कोसिस में,
मैं फिसलता हूँ ऐसे,
जैसे बंद मुट्ठी में रेत.
कहती है, “आप मेरे भगवान् हो”.
और वो तुलसी मेरे आँगन की.
मेरी बीबी है बिहार की.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी और मैं


झगड़े की शुरुआत,
रोटी से हुई.
मैंने कहा, “ये तो गोल नहीं है”.
उसने कहा, “खुश रहो, वरना ये भी तुम्हारी नसीब नहीं है”.
हद तो तब हो गयी,
करवा चौथ उसकी,
और उपवास मुझे रखना पड़ा.
बेगम पड़ी रहीं, दिन भर बिस्तर पे,
और मुझे खाली पेट,
उनके हाथों में मेहँदी,
और पावों में आलता लगाना पड़ा.

हर रिश्ता मेरा चुभता है उसकी आँखों में,
क्यों की, मैं उसकी माँ का बेटा नहीं बन पाया।
जवानी की सारी गलतफहमी मिट गयी,
सोचा था चार -चार शादी करूँगा,
मगर यहाँ एक से हिम्मत टूट गयी.
मुक्कम्मल जहाँ बसाने के लिए,
मैं दोस्तों के कहने पे घोड़ी चढ़ गया.
मुझे क्या पता था?
की कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

मेरी बीबी – देहाती


जब मेरी शादी होगी,
तो नाचेंगे बाराती।
मेरे शक्लो-सूरत पे,
तो कोई देख,
मेरी बीबी – देहाती।

मेरे आँखों पे होगा चश्मा,
और उसके मुख पे घूँघट लंबा।
उसको मिलेगा एक गवार,
और मुझको एक लाठी।

हंस – हंस कर, झूमेंगे,
झूम – झूम कर हँसेंगे,
वो अपनी ऊँची किस्मत पे,
और देख मेरी कामचलाऊं जोड़ी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुझे हिमालय चाहिए


मेरी निराशा के बीज,
के अंकुरण से बनी शाखाएं,
अपने काँटों से, मेरे जिस्म को,
नोचती हैं, कचोटती हैं,
और लहूलुहान करके,
खुद को पोषित करती हैं.

मेरी आशाओं के पुष्प,
जो मेरे कमरों, आँगन में,
महफूज हैं,
उनकी सुख रही और मुरझा चुकी,
पंखुड़ियां, मेरी भावनाओं को,
को कुचल – कुचल कर,
अपनी अधूरेपन का दंश मिटा रही हैं.

और मैं,
अपने जीवन के पथ पे,
इनका बोझ उठाये,
इनको सहेजे,
इनके दिए जख्म, दंश,
से प्रताड़ित हो कर भी,
इनको साथ लिए,
बढ़ रहा हूँ.

मैं बढ़ रहा हूँ,
इसलिए नहीं की,
मुझे किसी मंजिल की अब उम्मीद है.
इसलिए भी नहीं की,
कोई, कहीं, ये भाड़ मुझसे ले ले.
इसलिए भी नहीं की मैं तेज क़दमों से,
इनको पीछे छोड़ दूँ.
इसलिए भी नहीं की,
मैं इनका बोझ नहीं उठा सकता।
इसलिए भी नहीं की मैं कहीं,
ये बोझ लेकर नहीं बैठ सकता।

बल्कि इसलिए की,
मैं अपनी बेचैनी,
से भागना चाहता हूँ.
मैं अपने बेचैन मन को,
शांत करना चाहता हूँ,
इसको बांधना चाहता हूँ,
इसको साधना चाहता हूँ.
मैं नहीं जानता कैसे करूँ?
मैंने कभी इसको साधने,
बाँधने की कोसिस नहीं की.
ना सीखा, ना सिखने की कोसिस की.

मैं भाग रहा हूँ अपने सारे बोझ के साथ,
की कही मेरे मन को भटका दूँ,
कहीं इसको उलझा दूँ.
मगर मन तो ऐसे मृगचिका की तलाश में है,
की ना इसको कुछ मिल रहा,
ना ये मुझे छोड़ रहा.
मेरे मन ने मेरे जीवन को रेगिस्तान बना दिया है.

आज पूरा रेगिस्तान नाप कर,
मैं समझा की, नशों को कसरत से नहीं,
दिव्य – पदार्थों से नहीं,
साधना से साधा जाता है.
आज मैं भाग रहा हूँ,
हिमालय तक पहुंचने को.
शायद उस वीरान, भीषण ठण्ड में,
मन का ताप थोड़ा तो कम हो.
शायद, उस शीत-प्रदेश में,
मन को जल न सही, कुछ ओस की बुँदे ही मिले।

जी हाँ, सदा सुनते आया की,
पुरखे अपने जीवन की चौथी भाग में,
हिमालय जाते थे, मुक्ति को,
मोक्ष को.
मैं तो अपने जीवन के दूसरे पहर में ही,
उस हिमालय के तलाश में हूँ.
उस हिमालय की शरण का अभिलाषी हूँ.
मैं अपने हर बोझ को साथ ले कर,
उस चिरंजीवी, अविचलित, स्थिर,
भव-संटक की तलाश में हूँ.

इसलिए चल रहा हूँ.
इसलिए रुकता नहीं।
इसलिए जीवन में अब कोई आकांक्षा नहीं।
मुझे हिमालय चाहिए।
मुझे हिमालय की आगोश चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर