सजदा जरूर कीजिये


सफर कैसा भी हो, इश्क़ कीजिये।
जिंदगी कैसी भी हो, गुरुर कीजिये।
खुदा से कुछ मिले या ना मिले,
पर खुदा के दर पे, सजदा जरूर कीजिये।

गुनाहों का समुन्दर बहुत ही गहरा है.
इसमें उतरने से पहले, निकलने का हुनर कीजिये।
हुस्न के विषय में क्या लिखूं दोस्तों?
इनकी बाहों में उतर कर खुद को ना मगरूर कीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

परमीत सिंह धुरंधर

घर का श्रृंगार


मौसम के बदलने का इंतज़ार कर रहे हो,
तुम हुस्न वालों से वफ़ा की मांग कर रहे हो.
जो घर में आते ही माँ को अलग कर दे,
तुम उस औरत से घर का श्रृंगार कर रहे हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद भी दुर्बल सा


शहर का शहर है जल रहा,
हुस्न उसका, प्रबल इतना।
क्या वसुधा?
उसकी जुल्फों के लपटों से,
अम्बर तक झुलस रहा.

तारे -सितारे सब टूट रहे,
चाँद भी उनका हो गया है दुर्बल सा.
कोने -कोने में नभ के अमावस्या फ़ैल रहा,
रूप उसका, प्रखर इतना।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

वेणी उसके नितम्बों पे सम्मोहन का बाण लिए


समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के,
पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण,
कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में.
पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.

कट रहे, मिट रहे,
कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे,
भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.

आतुर हो, व्याकुल हो,
सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके,
गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तेरी चोली के बटन पे मरने लगे हैं


अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.

हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.

ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.

इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं

 

परमीत सिंह धुरंधर

मिल जाए तो छोडो मत


शराब पुरानी हो अगर,
नशा होता है गजब का.
राहें काँटों से सजी हो,
सबक कुछ तो होता है, नया सा.

क्या हुआ अगर हुस्न बेवफा ही सही?
मोहब्बत तो दे गयी वो, तुझे एक रात का.
शादी हो गयी हो,
दुल्हन हो या बहू उतर गयी हो.
मिल जाए तो छोडो मत,
हुस्न हुआ ही कब है किसी का.

मुझे मिल जाए किसी मोड़ पे तो,
थाम लूँ.
चमक उठे मेरे लबों पे,
लाली उसके लबों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये ताज मेरा क्यों नहीं है?


मुझे दर्द भी है,
मुझे इश्क़ भी है,
खुदा तू बता दे,
मुझे नशा क्यों नहीं है?

आँखों में ख्वाब भी,
आँखों में अश्क भी,
खुदा तू बता दे,
नींद क्यों नहीं है?

ये काँटे भी मेरे,
ये कलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये बाग़ मेरा क्यों नहीं है?

ये राहें भी मेरी,
ये मंजिल भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये सेहरा मेरा क्यों नहीं है ?

ये सल्तनत भी मेरी,
ये तख़्त भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये ताज मेरा क्यों नहीं है?

ये लोग भी मेरे,
ये गलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये महफ़िल मेरी क्यों नहीं है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं


मेरे कुत्ते भी बड़े कमीनें हैं,
काटने से पहले चुम लेते हैं.
देखने में बड़े मासूम हैं,
और आँखों से मजबूर लगते हैं.
मगर गोद में आते ही सीधा,
वक्षों पे निशाना साध देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भविष्य को बिगाड़ देती हैं


मुफ्त की रोटियाँ और हुस्न की मीठी बोलियाँ,
दोनों भविष्य को बिगाड़ देती हैं.
कौन हुआ है अमीर इस दौलत को पाकर?
ये तो आने वाली नस्लों तक को बिगाड़ जाती है.

शोहरतों के किस्से कई हैं संसार में,
मगर ये शोहरतें माँ- बाप से रिस्ता बिगाड़ देती हैं.
जिन्हे गुमान है हुस्न की वफ़ा पे, वो नहीं जानते की,
नागिन बिना दर्द के केंचुल उताड़ देती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में


हमें शौक मोहब्बत का, बर्बाद कर गया है,
उम्मीदे-वफ़ा उनसे, सब कुछ राख कर गया है.
जो खेलती हैं सैकड़ों जिस्म से यहाँ,
जाने कौन पंडित उसे शक्ति और संस्कृति लिख गया है?

जिसने उजाड़ा है यहाँ कई माँ का आँचल,
और पिता से उनके पुत्र को छीना है.
जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में,
जाने कौन पंडित उसे शुभ और गृह – लक्ष्मी लिख गया है?

 

परमीत सिंह धुरंधर