सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट ह्रदय में करवाती


अगर मोहब्बत में लड़कियाँ,
जिस्म को नहीं ह्रदय को देखतीं।
तो सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट वक्षों में नहीं,
ह्रदय में करवाती।

अगर लड़कियों की मोहब्बत में,
मीरा – राधा सा प्रेम होता, और वासना न होती,
तो वो प्रेम में उम्र और जवानी ना देखतीं।

अगर लड़कियाँ इश्क़ में,
आशिकों का जेब ना टटोलती।
तो सैनिकों को राखी नहीं, प्रेम – पत्र भेजतीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया


मेरी वफ़ा का सिला उसने कुछ ऐसे दिया,
मेरे बागों के फूल से गजरा गुंथा,
और किसी के सेज पे उसे तोड़ दिया।
आँखों की शर्म – हया थी बस मेरे लिए,
जुल्फों की छाँव किसी और को ओढ़ा दिया।
रूठ – रूठ कर मांगती थीं पायल – कंगन मुझसे,
और नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़कियाँ काबिल ही नहीं होती हैं


लड़कियाँ काबिल ही नहीं होती हैं,
वो श्रेष्ठ होती हैं, सर्वश्रेष्ठ होतीं हैं.
मगर इश्क़-मोहब्बत और वफ़ा में बस,
वो नेक नहीं, शरीफ नहीं, बल्कि फेक होती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लल्लू काठ का


कभी रिंकू मिली,
कभी पिंकी मिली।
फिर भी बस नहीं पाया,
घर प्यार का.
उनकी भी कोसिस थी,
कोई मिल जाए उन्हें,
लल्लू काठ का.

एक तो मैं बिहारी,
उसपे से खाटी,
देखने – मिलने में गवार सा.
जल्दी समझ जाती थी वो,
भविष्य नहीं है,
अपने इस साथ का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सेठ


हुस्न से बड़ा कोई फरेब नहीं,
और इश्क़ से बड़ा कोई एब नहीं।
जो निकल जाते हैं इन दोनों से बचकर,
उनसे बड़ा कोई सेठ नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

थालियाँ रुलायेंगी


इश्क़ मत करिये,
नहीं तो तन्हाईयाँ रुलायेंगी।

पिता को मत छोड़िये,
वरना रुस्वाइयाँ रुलायेंगी।

माँ को मत छोडो,
वरना थालियाँ रुलायेंगी।

भाई अगर साथ ना हो,
तो खुशियाँ रुलायेंगी।

और बहन को मत भूलों,
वरना सुनी कलाइयाँ रुलायेंगी।

और इन सबको छोड़ देता है,
उसको तो जिंदगी रुलायेगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

और चूल्हा तक बंट गया


ये समुन्दर भी मेरे थे, ये लहरें भी मेरी थी,
ऐसा जोर था मेरा की ये हवाएँ तक मेरी थी.
एक नदिया आकर मिली इन किनारों से,
और सब कुछ बिखर गया.

ये आसमा भी मेरा था, ये सितारे भी मेरे थे,
एक चाँद कहीं से निकल आया,
इन सरहदों के आँगन में,
और फिर सब कुछ बिखर गया.

ये उपवन भी मेरा था, ये मधुवन भी मेरा था,
ये भौरें भी सब मेरे थे.
एक कलि कहीं से खिल गयीं यहाँ,
और फिर सब कुछ बिखर गया.

ये खेत, ये खलिहान, ये बाग़,
सब कुछ दूर – दूर तक मेरा था.
एक डोली उतरी कहीं से,
आकर इस चौखट पे.
और चूल्हा तक बंट गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर