श्री कृष्णा


मैं खेलता ही नहीं,
खेलता भी हूँ.
मैं डीप जलाता ही नहीं,
दीपमाला बनाता भी हूँ.

यूँ ही नहीं कहते सभी,
मुझे मायावी और छलिया।
मैं पालता – पोसता ही नहीं सृष्टि को,
इसको नचाता भी हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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