कौन कहता है की मैंने?
मेनका को नहीं देखा।
बस गर्भ से निकल कर,
धरती पे शकुंतला को रोते नहीं देखा।
पेट भरने को उसका,
खगचर भी तैयार हैं लाखों।
पर इतनी मेनकाओं के होते,
एक शकुंतला को जन्मते,
किसी ने नहीं देखा।
परमीत सिंह धुरंधर
कौन कहता है की मैंने?
मेनका को नहीं देखा।
बस गर्भ से निकल कर,
धरती पे शकुंतला को रोते नहीं देखा।
पेट भरने को उसका,
खगचर भी तैयार हैं लाखों।
पर इतनी मेनकाओं के होते,
एक शकुंतला को जन्मते,
किसी ने नहीं देखा।
परमीत सिंह धुरंधर
सुबह हुई, फिर शाम हुई,
फिर रात तक वो परेशान हो गयीं.
एक बटन भी न खोल सका,
मैं चोली का उनके।
फिर अगली सुबह वो अपने,
कपडे -लत्ते समेटकर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।
सजाया – सवारा कमरे को अपने,
फिर इत्र से बिस्तर भी महकाया।
Shakespeare की नयी किताब ले कर,
जैसे ही रोमियो – जूलिएट के किस्से,
सुनाने बैठा,
वो अपने अंगों का भार लिए,
मेरे सीने पे सवार हो गयीं।
और फिर अगली सुबह,
अपने कपडे-लत्ते समेट कर,
फिर से डेटिंग साइट पे सिंगल हो गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा गली – गली में भटकना,
वो मज़ा कहाँ तेरे शहरों में?
मैंने पकड़े हैं कई चिड़ियाँ,
ताल – तलैयाँ और मुंडेरों पे.
वो चिड़ियाँ कहाँ बसते हैं?
हाँ तुम्हारे शहरों में.
मेरा वो निकलना साँझ ढलें,
और उनका छज्जे पे आना.
वो कंघी का करना सवरें बालों में,
और मेरा घंटों तकते रहना।
वो दीवारें प्रेम में,
कहाँ तुम्हारे शहरों में?
यहाँ मदिरा है, पान है,
पर वो ताड़ी कहाँ इन शहरों में?
यहाँ महफ़िल है, प्यार है,
पर वो इंतज़ार कहाँ इन शहरों में.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी काली – काली आँखों में हम काजल बनकर बह जाएँ,
तेरे गोरे – गोरे गालों पे कहीं तिल बन कर ठहर जाएँ.
इस देश – सीमा के विवादों से दूर, तुझे लेके कहीं बस जाएँ,
मेरे नन्हें – मुन्नें चार, मेरा नाम लेकर, हर सुबह तुझसे लिपट जाएँ।
परमीत सिंह धुरंधर
ए चिड़िया,
तू उड़ती है कैसे?
नन्हें परों पे हौसला लेकर।
सुबह – सुबह निकल आती है,
सबसे पहले अपने घोसलें से.
जाने क्या ढूंढती है?
तुझे क्या मिलता है?
यूँ चहक – चहक कर,
गुंजन करने में.
ए चिड़िया,
तू फुदकती है कैसे?
बाज के शहर में,
यूँ निडर होकर।
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ नए तरीके से सील रहीं हैं सलवारें उनकी,
कुछ दर्जी का दोष है, कुछ उनकी जवानी का.
यूँ ही नहीं निकलते हैं लोग गलियों में,
कुछ गर्मी का असर है, कुछ उनकी जवानी का.
और कब तक बांधें वो भी लज्जावस अपनी साँसों को,
कुछ मेरी बाहों का असर है, कुछ उसकी जवानी का.
परमीत सिंह धुरंधर
हुश्न का मैं शौक़ीन हूँ,
खाता सतुआ और नून हूँ.
जिला है छपरा,
बिहारी मगरूर हूँ.
दोस्तों की कमी है,
दुश्मनों की भीड़ है.
सबके दिलों में बनके,
एक गाँठ मौजूद हूँ.
बस वक्षों पे मेरा निशाना है,
कहती सब मुझे कमीना हैं.
किसी की नफरत में,
तो किसी की चाहत में,
रखता वजूद हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं खेलता ही नहीं,
खेलता भी हूँ.
मैं डीप जलाता ही नहीं,
दीपमाला बनाता भी हूँ.
यूँ ही नहीं कहते सभी,
मुझे मायावी और छलिया।
मैं पालता – पोसता ही नहीं सृष्टि को,
इसको नचाता भी हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
सुन लो ए VC जी,
बाँध लो खटिया और हो जाओ तैयार जी.
जब छिड़ गयी है जंग तो भीषण होगी,
तांडव होगा शिव का और बिनाश भी.
कल तक चुप थे ये थी गलती हमारी,
अब ना सहेंगें तुम्हारे तुगलकी फरमान जी.
ये धरती है बुद्ध और महावीर की,
ये धरती है सीता और गुरु गोबिंद की.
प्राणों पे खेल कर इसे संवारा है,
ना फैलने देंगे अधर्म और पाप जी.
परमीत सिंह धुरंधर
माना सत्ता पे बैठे सत्ताधीशों की नजरें बाज सी होती है,
पर ये धरती है बिहार की साहब,
यहाँ की हर चिड़इयाँ सौ – सौ बाजों पे भारी है.
जब भी गहन निंद्रा में सो जाता है कोई अपने मद और दम्भ से,
तो ये धरती है बिहार की साहब,
यहाँ का एक शिक्षक वैसे सौ – सौ महानंदों पे भारी है.
परमीत सिंह धुरंधर