वो यौवन जिसे चोली बाँध न सके


मैं शहर की दुकानों पे,
गावं के खिलोने ढूंढ रहा हूँ.
त्रिशंकु की स्थिति में फंसा मैं,
अपने लिए एक विश्वामित्र ढूंढ रहा हूँ.

अलौकिक – अद्भुत – सुंदर,
सुंदरियों के बीच में,
वो पनघट – कच्ची पंगडंडियों पे,
लचकती – लहराती -बलखाती,
कमर ढूंढ रहा हूँ.

नए युग की इन अप्सराओं के बीच,
वो चोली की डोर और घूँघट वाली,
शर्मीली – मासूम गोरी ढूंढ रहा हूँ.

इस मोबाईल – फ़ेकबुक – ट्विटर के जाल में,
वो पोस्टकार्ड, डाकिये की घंटी,
और एक अखबार का पेज ढूंढ रहा हूँ.

दौलत के पीछे तो मैं भी भाग रहा हूँ,
सफलता के लिए जीवन में,
ये हीं दब के, दुबक के बैठा हूँ.
पर सच में, मन से,
मैं इस भीड़ में हर सुबह – शाम और रात,
बस वो खेतों में घांस काटती ग्वालिन,
पोखर में कपडे धोती घोबन,
और खलिहान में धान पिटती,
बंजारन का यौवन ढूंढ रहा हूँ.

वो यौवन, जिसे चोली बाँध न सके,
वो यौवन, जिसे धूल – मिट्टी,
और धूप – ठण्ड कुम्हला न सके.
वो यौवन, जिसपे ठहर कर बूंदें मोती बन जाए,
वो यौवन, जिसे भूख – गरीबी,
बच्चों का स्तनपान भी मिटा न सके.
मैं उस प्राकिर्तिक – नैसर्गिक यौवन की,
एक झलक ढूंढ रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उनका श्रृंगार देखिये


प्रेम में मेरा प्रुस्कार देखिये,
मेरी तन्हाई और उनका श्रृंगार देखिये।
एक भी दूकान नहीं ऐसा जो मुझे रासन दे,
और उनका गर्म बाजार देखिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम बूढ़े क्या हो रहे?


शहर अंदाज बदल रहा है,
चाँद आकार बदल रहा है,
हम बूढ़े क्या हो रहे?
हर कोई अपनी जबान बदल रहा है.

घर, बाहर और बाजार तक,
आने – जाने और मिलने पे,
लोग नजरे चुरा रहे हैं.
कल तक जो इंतज़ार करते थे मेरा चाय पे,
अब वो हमसे छुप के,
किसी और के साथ, चुस्की उड़ा रहे हैं.

अपने – पराये, नौकर – चाकर,
अब और क्या कहे किसी की?
अब तो दाल में घरवाले बिना मुझसे पूछे,
नमक लगा रहे हैं.
हम बूढ़े क्या हो रहे?
हर कोई अपनी जबान बदल रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँझी बिहारी


शहंशाह ताज तो बना सकते हैं,
अपने मुमताज के लिए.
लेकिन वो माँझी बिहारी होते हैं,
जो पहाड़ को गिरा दें अपने महबूब के लिए.

 

Dedicated to Dashrat Manjhi from Bihar.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सैंया बना दे ता हर साल लरकोरी


सखी कैसे खेलीं होली?
सैंया बना दे ता हर साल लरकोरी।
अतना ना अब हो गइल बा झुलौना,
कोई कंधा पे कूदे, त कोई धइले रहे साड़ी।
रोजे रतिया पीया के कहेनी,
तनी रउरो सोची परिवार – नियोजन के,
त खटिया से कहेली सास,
अभी देखे के बा अउरो उनकरा पोता – पोती।
सखी कैसे खेलीं होली?
सैंया बना दे ता हर साल लरकोरी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आस्फाक – आफताब


जात – धर्म – मजहब में बंधकर,
कब किसने दोस्त बनाया है?
विस्मिल को आस्फाक मिलें,
तो मैंने भी आफताब को पाया है.

अपनों ने ही लुटा है,
खंजर पीठ में गड़ा के.
सिरोजदुल्ला को मीरजाफर मिलें,
तो पृथ्वीराज को जयचंद ने हराया है.

कब नारी ने सम्मान के बदले,
सम्म्मान लौटाया है.
जिसने उसे भेजा गैरों के बाहों में,
मेनका ने उसकी के लिए मातृत्व को ठुकराया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई तो फूल खिला दो


सीना – सीने से लगाकर,
वो बोली धीरे से कानों में,
कोई तो एक फूल खिला दो,
अब इस आँगन में.

मन ऊब गया है इस खेल से,
जो खेलते हैं बस बंद कमरे में.
कोई तो एक खिलौना दे दो,
की मैं भी खेलूँ खुले आँगन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्रसव-पीड़ा


काँटों ने कब रोका है तुम्हे?
गुलाब को चूमने से.
मगर चुभ जाए तुम्हे तो समझो,
की तुम बहुत असावधान हो राहों में.

बाधाएँ तो निरंतर हैं,
पल – पल में जीवन के.
प्रसव-पीड़ा से नारी को,
कब रोका है मौत के भय ने?

उसी माँ के दूध से तुम हो,
फिर भय कैसा इन प्राणों का?
और कैसे छोड़ दूँ माँ को अपने,
रूप – रस में फंसकर,
बेवफा मेनकाओं के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Darkness, Age and Bed: An Interesting Triangle


Darkness is epistatic to the age on the bed.

Parmit Kumar Singh

कैसे पुरुषार्थ करे मानव?


मेरे कदम चलना नहीं चाहते,
और पेट भोजन का मोह त्यागना नहीं चाहता।
नयन चाहते हैं उसके यौवन पे ही,
सदा – सर्वदा टीके रहें।

कैसे पुरुषार्थ करे मानव?
जब जिस्म उसके आगोस की,
गुलामी, आँखों की मक्कारी,
को तोड़ना नहीं चाहता।

 

परमीत सिंह धुरंधर