चाहत


तुमसे दूरी,
दो हाथों की ही सही,
अब बर्दास्त नहीं,
जिंगदी कैसी भी हो,
बिन तुम्हारे अब इसकी चाह नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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