I don’t have a house


You are mine
Only mine
I want you in my crime.
I don’t have a house
Nor a bright future ahead
But I need you to move on
In my life.
I can control my breath
But can not control my heart beats
I need you to keep myself alive.

 

Parmit Singh Dhurandhar

तनी देखि ना पतरा पंडित जी


बड़ी भारी भइल बा जोवन
कर अ ता बड़ी जुलम।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

चढ़ल जाता इ उम्र
सूना – सूना जाता हर सावन।
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

सारी सखियाँ भइली लरकोरी
झुल अ तारी भरके गोदी
ललचे रहल – रहल हमरो मन.
तनी देखि ना पतरा पंडित जी
कहिया लागि लगन?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का


ए चाँद मेरी गलियों में
आना – जाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जिसने धारण किया है
विष को अपन कंठ में
उसके अधरों के पान की
अभिलाषा छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

भूत – भभूत – डमरुँ
पे जो रीझ जाए
उसपे नयनों के
तीर चलाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जब – जब आस टूटती है
मानव की
तब प्रभु शिव हरते हैं
पीड़ा भक्तों की.
मुझे ऐसी भक्ति से
भटकाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

मुझसे भी बलिष्ठ और कर्मनिष्ठ
बहुत है यहाँ।
इस अवघड-फ़कीर को
आजमाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फ्रांस जीत ले गइल विश्व ख़िताबवा


चोलिया के हमारा
मसकअता सियनवा।
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो लूट जाइ सारा जोवनवा
बलम, गवनवा करा द ना.

सबके लागल बा हमपे नयनवा
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ धीर के बाँधवा
बलम, गवनवा करा द ना.
मुखिया चाहअता हमसे मिलनवा
बलम, गवनवा करा द ना.

भइल मुश्किल बा खेळल अब फगुआ
बलम, गवनवा करा द ना.
जवार सारा, चाहे पकड़े के कलइया
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ ना त हमरो चारपाइयाँ
बलम, गवनवा करा द ना.

फ्रांस जीत ले गइल विश्व ख़िताबवा
बलम, गवनवा करा द ना.
हेमा ले अइली जीत के सोना के मेडलवा
बलम, गवनवा करा द ना.
कहियो टूट जाइ हमरो नथुनिया
बलम, गवनवा करा द ना.

परमीत सिंह धुरंधर

वृक्षों को ना काटो


ए मेरे दोस्तों
वृक्षों को ना काटो।
तुम तो अपनी जमीन छोड़ रहे
किसी को तो जमीन पे रहने दो.

आसमान में उड़ना
पक्षियों को पसंद है.
मगर तभी तक
जब उनका कोई बसेरा हो.
तुम तो अपना घर तोड़ रहे हो
किसी को तो घर बसाने दो.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे माँ की दुआओं का दौर है


सितारों से कह दो
ये रहनुमाओं का दौर है.
तन्हा हूँ मैं यहाँ
मगर ये मेरे इरादों का दौर है.

मिटना मेरे नसीब में तय है
मगर मिटने से पहले
ये मेरे हौसलों का दौर है.

मेरी बुलंदियों को किसी की
ताबीज नहीं चाहिए।
मेरे सर पे मेरी माँ का हाथ है.
जब तक खड़ा हूँ यहाँ
तो समझों की
मेरे माँ की दुआओं का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

गाँव छोड़ दी मैंने


इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

उन्हें शक था
गाँव के जाहिल लोग
इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगें।
मगर अंत में उनके शहर के लोगों ने
बीच में दीवार चुनवा दिया।
गाँव छोड़ दी मैंने
मगर उनसे शहर न छूटा।

अंत भी इस कदर हुआ
इश्क़ का मेरे
की बेवफाई का हर ठीकरा
मेरे सर ही फूटा।

इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

परमीत सिंह धुरंधर

दहेज़ में बैल


बैल मिलल दहेज़ में
अब का बथान चाहता र अ.
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

बैल भुखाइल-प्यासल
दिन भर नाद पे
तू कहाँ भूँसा डाल अ ता र अ?
अतना सुनर चिड़िया के छोड़के
कहाँ दाना डाल अ ता र अ?

परमीत सिंह धुरंधर

शहर – गाँव


शहरों में घर नहीं मकान है
बाकी सब जगह बस दूकान हैं
जहाँ बस दौलत ही एक पहचान है.

गाँव में आँगन है, बथान है
खेत है खलिहान है
बाग़ और बागान है
जहाँ झूलते झूले छूते आसमान हैं.

शहरों में रौशनी नहीं
चकाचौंध है.
जिस्म की, फरेब की
हर किसी को रौंद कर
आगे बढ़ने के जिद की.

गाँव में उषा है
गोधूलि बेला है
जुगनू के साथ हाथ मिला कर
अंधेरों से लड़ती दिए की बाती।

शहर में बिन व्याही पतोहि है
बेटी से पहले माँ ने व्याह रचाई है.
एक घर में रह कर भी
सबके बीच गहरी खाई है.

गाँव में सब कुवारी
सबकी बेटी
और बूढी, सबकी माई हैं.
घर छोटा और टूटा – फूटा
पर खाते सब संग
और सबकी संग ही लगती चारपाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की


मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
मछली और चिकन की थाली में भी
परोसती हैं चोखा, चटनी और खिचड़ी।

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
दही -चिउरा पे खिलाती है
पापड, अदौरी – तिलोड़ी।

मेरी गृहलक्ष्मी बिहार की
दोपहर के खाने में ऑफिस में
भेज देतीं है
सतुआ, आचार और हरी मिर्ची।

परमीत सिंह धुरंधर