वैराग


पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.

मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

वो जिस्म में एक दिल रखते हैं


मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

कड़ाके की सर्दी हो
या भीषण गर्मी
बहते हैं दोनों झूम-झूम के.
मेरे तपते पीठ और ठिठुरते जिस्म
की खबर रखते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

मेरे बच्चों की भूख
मेरे परिवार के भविष्य
का ख्याल रखते हैं.
मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

जब तक ना बांध दूँ
दोनों को नाद पे
पहला खाता नहीं है.
और बाँधने के बाद दूसरा
पहले को खाने नहीं देता है.
नित – निरंतर, नाद पे, खूंटे पे
खेत में, बथान में
अपने सींगों को उछाल – उछाल
वो प्रेम की नयी परिभाषा रचते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

खाते हैं घास – फुस
इठला कर, उमंग से
पर नाद में सने नाकों से
घर के पकवानों पे नजर रखते हैं.
अपने हाथों से गृहलक्ष्मी जो ना
उन्हें भोग लगाए
तो फिर नए पकवानो के तलने
और भोग तक उपवास करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों?


सोचता हूँ बहुत
जब भी वृक्ष को देखता हूँ
क्यों इसकी शाखाओं पे कांटे और फूल दोंनो हैं?

टटोलता हूँ बहुत
अपने अंतर्मन को
क्यों मैं उम्र के साथ दोराहे पे खड़ा हूँ?

हर नया रिश्ता बनाने के बाद
धड़कने मायूस और उदास
क्यों उषा से ज्यादा निशा में चमक है?

जब भी उसे बाहर में सुनता हूँ
भ्रमिक हो जाता हूँ
पतिव्रता के खिलाफ खड़ी
दुनिया की औरतों को नयी रौशनी देती
वो क्यों अपनी बेटी को सावित्री का पाठ पढ़ाती है?

परमीत सिंह धुरंधर

नारी तू


नारी तू अनमोल है
अमूल्य है
इस धरा पे स्वर्ग के
तुल्य है.

तू सजे – संवरे
तो सितार में धुन है.
तू विचरण करे
तो तुझपे प्रकीर्ति स्थिर है.
तेरे दो नयनों में
सागर असीम है.
नारी तू अमूल्य है.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी के किस्से


कुछ जवानी के किस्से ऐसे भी हैं,
अधरों से अधरों तक आते – आते
उम्र गुजर गयी.

संसार में, हर कोई स्वघोषित बाजीगर है
खेलना तो दूर साहब
बस दूसरों पे हंसने में उम्र गुजर गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

ख्वाब


हर ख्वाब के टूटने पर
एक समंदर बनता है.
कोई बहा देता है आँखों से
कोई दिल के अंदर रखता है.

मोहब्बत तो बस एक दरिया है
कोई डूब-डूब के पीता है
और कोई पी – पी के डूबता है.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


सफर कीजिये
किसी के साथ मगर.
क्या पता कब जरुरत पड़ जाए?

गुरुर कीजिये जवानी पर
शादी के बाद मगर.
क्या पता कब आपकी जवानी
किसी के हाथों का खिलौना बन जाए?

परमीत सिंह धुरंधर

संवर – संवर कर आईने में


संवर – संवर कर आईने में
यूँ इठलाया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

ढल जाएगा जब तुम्हारा
ये गोरा बदन.
मुख मोड़ लेगा आइना
भी तुमसे सनम.
तो ऐसे हरजाई से
दिल लगया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

झूलते हैं पंक्षी
जिन शाखाओं पे
सावन में.
छोड़ते नहीं उन्हें कभी भी
पतझड़ में.
तुम यूँ उन्हें जाल में
फंसाया न करो.
दिलों का रिस्ता है
इसे यूँ गंवाया न करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

भीष्म और बरगद


मेरी लड़ाई
मेरे अस्तित्व की नहीं
मेरे अंतरात्मा की बन गयी है.
मेरे सही या गलत की नहीं
मेरे विश्वास की बन गयी है.

मैं जानता हूँ
की मैं टूट रहा हूँ
पिछड़ रहा हूँ
थक रहा हूँ
पर इन सबके बावजूद
मेरा टीके रहना जरुरी है
उस बरगद की तरह
जिसके नीचे क्या ?
दूर – दूर तक कोई और पेड़ – पौधा
नहीं होता।

जी हाँ जब जिंदगी आप की
बरगद हो तो
लोग दूर -दूर ही रहते हैं
की कहीं विकास ना रुक जाए.
कहीं भुत – पिचास न पकड़ ले.
ये तो वो ही इनकी छावं में आते है
बैठते हैं
जो मुसाफिर हों, राही हो
जिनकी मज़बूरी है थकान मिटाने की.
या फिर प्रेमी-युगल हो
जिनकी मज़बूरी हो निवस्त्र हो कर भी
एक वस्त्र या चादर के आड़ की.

बरगद, जिसके कोई करीब नहीं
बरगद, जिसके फल की किसी को चाह नहीं।
बरगद, जिसके गिरने पे आँधियों में
एक धाराम सी आवाज होती है
और गावं समझ जाता है
और जब गिरता है बरगद तो
या तो रात का अँधेरा और सनाटा होता है
या फिर ऐसा तूफ़ान जो दिन में भी
सबको घरों में छिपने को विवस कर दे.

तब उस अँधेरे से और उस तूफ़ान से सिर्फ
वो बरगद ही जूझता है.
और वो गिरना भी देखिये
की उसी पल से लोग उत्सव मनाते हैं
बच्चे उछाल -उछाल कर लांघते हैं
विजय-उल्लास की तरह.
और लोग ज्यादा -ज्यादा धो लेना चाहते हैं
उसे चूल्हे या अलाव में लगाने को.
गिरना भी ऐसा हो और मौत भी ऐसा हो
की जन-सैलाब उमड़ उठे.
भीष्म की सैया पे
पांडव – कौरव क्या?
कर्ण, दुर्योधन, गांधारी, धृतराष्ट,
ही नहीं
स्वयं जगत के पालनहारी
कृष्णा कराह उठे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास रक्तपात की


रक्त की हर बून्द में प्यास रक्तपात की
वो राजपूत नहीं, जसके आँखों में ख्वाब नहीं
कुरुक्षेत्र में शंखनाद की.

जो लोट गए हैं अकबर की चरणों में जाकर
उनके नस – नस को एहसास नहीं
राजपूतों के इतिहास की.

परमीत सिंह धुरंधर