उसे सुबह में हेलो भी नहीं बोल पाया


टूट कर भी मैं बिखर नहीं पाया
मौला जाने कैसी हसरत थी तेरी?
जिसे चूमा जी भरकर रातों को
दिल छोड़िये,
उसे सुबह में हेलो भी नहीं बोल पाया।
मौला लिख रहा है जाने तू कैसी जिंदगी?
आज तक रातों को मैं सो नहीं पाया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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