मैं ऐसे तो शर्म उतार ना पाउंगीं


तू नजर तो रख मेरे जिस्म पे
दिलों में अहसास खुद-ब-खुद आ जायेगी।
तू चाहत क्यों रखता है मेरी अपने सेज पे?
ख़्वाबों में बिन बुलाये ही आ जाउंगी।

कुछ फासले बन ही जानते हैं राहों में
मंजिलों पे समेट लेने को उन्हें.
तू क्यों थामना चाहता हैं इन राहों में?
मैं ऐसे तो शर्म उतार ना पाउंगीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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