राजपूतों का अहंकार


दौर तुम्हारा हो सकता है
शौर्या तुम्हारा नहीं।
कलम तुम्हारी हो सकती है
इतिहास तुम्हारा नहीं।
वक्त तुम्हारा हो सकता है
मेरा दम्भ तुम्हारा नहीं।
सत्ता तुम्हारी हो सकती है
मगर राजपूतों का अहंकार तुम्हारा नहीं।
विश्व को जीत सकते हो तुम
पर राजपूतों की जितना, वश में तुम्हारे नहीं।

जीवन का सार


अपनी – अपनी जिंदगी में
अपना – अपना ख्वाब है.
तुम चाहो तो साथ चल लो
वरना अकेला ही ये संसार है.

छोटी सी उम्र में ही
अब चेहरे पे तनाव है.
तुम चाहो तो इसे हर लो
वरना जीवन का यही सार है.

प्रेम कहाँ सच्चा?
सब धोखा और व्यापार है.
तुम चाहो तो ये सौदा कर लो
वरना लम्बी यहाँ लगी कतार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर