मेरे नयन, नख से तीखे


ऐसा भी नहीं की मैं सजती रहूं दिन भर
ए आइना अपनी औकात में रह.
ऐसा भी नहीं की मैं सजना छोड़ दूँ
ए आइना अपनी औकात में आ.

अभी तो अंग खिलें हैं मेरे
अभी तो पंख खुलें हैं मेरे
ऐसा भी नहीं की उड़ना छोड़ दूँ
ए हवा अपनी औकात में आ.

ये घोंसले उन खगों के हैं
जिनमे अब उन्माद नहीं।
मेरे नयन, नख से तीखे
तो ए निशा अपनी औकात में आ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शर्म


तेरे अधरों पे मेरा जीवन बस रहा है
और शर्म से तुम दूर जा रही हो.
तू भी जानती है ये सच की
स्वयं तुम्हारी धड़कन ये कह रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फिर उठ न सके चारपाई से


वो जो कल तक गले लगाते थे महफ़िल में उछल कर
आज हँसते हैं मेरी हर रुस्वाई पे.

हुस्न समझता ही नहीं इश्क़ में
की मौत अच्छी है उसकी बेवफाई से.

ऐसे टूटा इश्क़ में की पिता भी रो पड़े
दर्द ही ऐसा था, फिर उठ न सके चारपाई से.

मुझे मंजिल मिले या ना मिले खुदा
किसी और को ना दिखाना आइना उसकी बर्बादी के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ नहीं करता तन्हाई में


हर तन्हा इश्क़ नहीं करता तन्हाई में
हर मोहब्बत की मंजिल नहीं सजती है शहनाई से.

तुझे क्या पता कैसे सजा के रखा है यादों में तुझे?
हर दर्द ब्यान नहीं होता आँखों की रुलाई और शब्दों की गहराई से.

लड़ेंगे हम आखिरी साँसों के दम तक
इतिहास नहीं बनता सिर्फ जीत की मिठाई से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ए दुश्मन


ए दुश्मन तेरी आँखे मुझे पसंद बहुत हैं
अपने मुखड़े से ये घूँघट निकाल दे.
सुना है तेरी लबों को लहू की चाहत बहुत है
तू चाहे तो मेरे जिस्म से मेरा दिल निकाल ले.

सुना है की तेरे चर्चा में जिक्र आ जाता है मेरा
तू चाहे तो मेरी गर्दन अपने दर पे बाँध ले.
तू बस गया है सरहदे – जमीन से जाकर दूर
तू चाहे तो मेरे जमीन पे और कहर बरपा ले.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सालों से बैचैन है दिल


दौलत कमा के देखिये
शौहरत कमा के देखिये
जो मिट जाए दर्दे-दिल
तो हमको बता के भी देखिये।

सालों से बैचैन है दिल
बिना सुकून के एक पल भी.
जो कोई दवा या दर पता हो आपको
तो हमपे आजमा के भी देखिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कैसे ज़िंदा हूँ सालों से?


ज़िंदा जिस्म है, रूह नहीं
तनहा रूह है, जिस्म नहीं।
मैं कैसे ज़िंदा हूँ सालों से?
आके देख ले.
साँसे चल रहीं है, दिल नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी शोहरत को इससे भी अधिक क्या चाहिए?


परिंदों को आसमा से अधिक क्या चाहिए?
बहारों को गुलिस्ता से अधिक क्या चाहिए?
दिल है मेरा, ये कुछ भी नहीं माँगता
तुझसे तेरी एक नजर के अधिक क्या चाहिए?

संभाल लेंगे खुद को तेरी जुदाई में
बस एक जिंदगी है पास,
चंद साँसों से अधिक क्या चाहिए?
दर्द आंसू में बदल जाए ऐसा भी नहीं होगा
मोहब्बत में तुझे इससे भी अधिक क्या चाहिए?

देखना सेज पे कहीं मेरी याद ना आ जाए
अब दुआओं में इससे अधिक क्या चाहिए?
सलामत रहे तेरी जवानी यूँ ही
अब इस शहर को इससे अधिक क्या चाहिए?

प्यास यूँ ही रहेगी लबों पे मेरे
तेरे मयखाने को इससे अधिक क्या चाहिए?
हर दौलत संभाल के रखी है एक रुमाल में बाँध के
मेरी शोहरत को इससे भी अधिक क्या चाहिए?

 

परमीत सिंह धुरंधर