जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती


हर किसी की मोहब्बत में ख्वाइशें नहीं होती
बिस्तर तो होती है पर सिलवटे नहीं होती।

क्या संभाले कोई जिंदगी को ?
सँभालने से जिंदगी की पूरी जरूरतें नहीं होती।

शिकायतें बढ़ती जा रही हैं उसकी
हर रात जिंदगी के साथ.

अब चाँद कहने और चुम्बनों से
दूर उनकी शिकायतें नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Give me the crowd


Oh Baby, Oh Baby
Give me the crowd
Give me the crowd
Just shake your booty
And make them loud.

You can do it
You can do it
You can do yeah
Just hold your breath
And switch off the light.
Just shake your booty
And make them loud.

 

Parmit Singh Dhurandhar

आवो जमाने को बिगाड़ के देखें


सोचता हूँ की उनसे रिश्ता सुधार के देखें
किसी मोड़ पे फिर से उन्हें पुकार के देखें।
और एक छोटी सी इल्तिजा है दोस्तों
की आवो फिर से बैठें एक साथ
और जमाने को बिगाड़ के देखें।

वो गुजरे सामने से अपने
और उनको हम छेड़ के देखें।
वो अपनी आँखों में त्रिस्कार भर के
फिर हमें नफ़रत भरी नजरों से देखें।
और एक छोटी सी इल्तिजा है दोस्तों
की आवो फिर से बैठें एक साथ
और जमाने को बिगाड़ के देखें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Statue of Unity


दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है
इस कदर रिश्ते टूट और बन रहें हैं
की दुकानों में सही में
गर्भनिरोधक दवाओं की कमी हो गयी है.
और तुम बना रहे हो Statue of Unity
जहाँ देह, बिस्तर और बिस्तर आँगन बदल रही है.

अगर बनाना ही है Statue
तो अहिंसा का बनाओ, पंचशील का बनाओ।
अरे कुछ नहीं तो कम – से – कम
आरक्षण का बनाओ।
जिसने आज ७० साल में इतना unite कर दिया
की देखो आज हर जाति आरक्षण मांग रही है.
दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है.

और Statue of Unity तो तमाचा है
हमारे गालों पे
भला हम कब unite थे.
तभी तो हमें मुगलों ने लूटा ,
तुर्को, अफगानों और अंग्रेजों ने लूटा।
और आज ७० सालों से अपनी सरकार
लूट रही है.
दुकानों में दवाओं की कमी हो गयी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेचैन सी जिंदगी Crassa की


बेचैन सी जिंदगी Crassa की
चैन की कोई उम्मीद नहीं।
बंध चुका हूँ चारो ओर से ऐसे
की इस चक्रव्यूह का कोई अंत नहीं।

किसे पुकारू, किसकी और देखूं?
किसी दिशा का ध्यान नहीं
किसी क्षण विश्राम नहीं।
आराध्या मेरे कैलाश पे
पर मैं भगीरथ नहीं।
राम तो मेरे अंदर हैं
पर मैं भक्त हनुमान नहीं।

अतः परमार्थ होगा पिता के नाम पे
अभिमन्यु को परिणाम की चिंता नहीं।
यूँ बाँध दूंगा काल को समर में
की पिता के मनो-मस्तिक पे
फिर कोई भार नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहार थे बड़े – बड़े उस्ताद रे


दही पर के छाली छील के
बोले रे सैयां ढील के.
मैं हूँ खिलाड़ी, पक्का बिहारी
चराता हूँ भैंस, बैठ भैंस की पीठ पे.

उठा के घूँघट चट सखी
सवार हो गयी छाती पे.
पिसती हूँ मन भर गेंहूँ मेरे राजा
जांत पे एक ही हाथ से.
दही पर के छाली छील के
खिलाती थी माँ सीधे खाट पे.

छोड़ो रानी मायके की कहानी
अब आ गयी हो मेरे गांव में.
यहाँ का मुसल, यहाँ का जांता
भारी पड़े हर पहलवान पे.
सुनो राजा, मैं हूँ कुवारी छपरा से
चढ़ी डोली,
जिसके कहार थे बड़े – बड़े उस्ताद रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी उतरी है जवानी उनपे


मोहब्बत में होती है बगावत नहीं
बगावत में होती है मोहब्बत नहीं।

ये वो फितरत है इंसानों की दोस्तों
जानवरों में ऐसी कोई चाहत नहीं।

ऐसी उतरी है जवानी उनपे
की किसी के दिल को राहत नहीं।

कैसे संभाले खुद को Crassa
की धड़कनों पे होती सियासत नहीं।

मुझे पता है वो मेरी नहीं होंगी
अपनी जेब में वो दौलत नहीं।

जी लेंगें यूँ ही उनकी यादों में
ह्रदय में अपने कोई और विरासत नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो अपना पता दे गयीं


वो उम्र भर की दुआ दे गयीं
नजर मिली तो दवा दे गयीं.

ये शहर ही ऐसा है
की हर कोई अकेला है.

वो किताबों में छुपाकर
अपना पता दे गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर